पक्षी विज्ञानियों की मानें तो भारतीय उपमहाद्वीप के देशों की तुलना में यूरोपीय देशों में गौरैया की संख्या बहुत अधिक तेजी से गिर रही है। पक्षी विज्ञानी तेजी से बढ़ते औद्योगीकरण, वायु प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण को इसके लिए जिम्मेदार मानते हैं। वैज्ञानिकों की मानें तो कृषि उत्पादन में अत्यधिक रासायनिक तत्वों के इस्तेमाल से भी गौरैया की संख्या में कमी आई है।
विशेषज्ञों की टीम करेगी अध्ययन
उत्तराखंड में गौरैया को संरक्षित करने के लिए भारतीय वन्यजीव संस्थान और वन विभाग के विशेषज्ञों की टीम संयुक्त रूप से तमाम पहलुओं पर अध्ययन करेगी। पक्षी विज्ञानी डॉ. सुरेश कुमार के मुताबिक गौरैया को लेकर प्रस्तावित अध्ययन में उनके रहन-सहन और संख्या में आए बदलाव पर अध्ययन किया जाएगा।
2010 में शुरू हुआ था गौरैया दिवस
दुनिया में पहली बार गौरैया दिवस 20 मार्च 2010 को मनाया गया था। गौरैया पक्षी के संरक्षण को लेकर दिल्ली सरकार ने तो साल 2012 में इस पक्षी को राज्य पक्षी का भी दर्जा दे दिया था। उधर, भारतीय डाक विभाग ने नौ जुलाई 2010 को गौरैया पर डाक टिकट जारी किया था।
आओ गौरैया को मिलकर बचाएं
घर आंगन में चहकने, फुदकने वाली गौरैया कहीं विलुुप्त न हो जाए, इसके लिए सभी को पहल करनी होगी। गौरैया दोबारा हमारे घर आंगन में चहके इसके लिए घर आंगन में न सिर्फ अनाज डाले वरन आंगन में मिट्टी से बने बर्तन में पानी भी रखें। घर में आंगन न हो तो छतों पर अनाज डालें और साथ में पानी रखें। गौरैया के लिए घोंसले लगाएं। घर के आसपास जमीन खाली हो तो पेड़ पौधे लगाएं ताकि गौरैया अपना घोंसला बना सके।
देश दुनिया के शहरों में गौरैया तेजी से विलुप्त हो रही है, जो चिंता का विषय है। राहत बात यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में गौरैया की संख्या अब भी पर्याप्त है। प्रत्येक व्यक्ति को गौरैया के संरक्षण को लेकर जागरूक होना होगा। गौरैया महज एक पक्षी नहीं है, बल्कि हमारे जीवन का अभिन्न अंग है। गौरैया के संरक्षण के लिए वन विभाग के विशेषज्ञों की मदद से अभियान चलाया जाएगा।
-डॉ. सुरेश कुमार, वरिष्ठ पक्षी विज्ञानी, भारतीय वन्यजीव संस्थान