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विश्व गौरैया दिवस : शहरों से गुम हुई गौरैया की चहचहाहट, ग्रामीण क्षेत्रों में अब भी अच्छी संख्या में मौजूद

Sat, 20 Mar 2021 01:21 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal अरविंद सिंह , अमर उजाला, देहरादून
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गौरैया - फोटो : अमर उजाला
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दो दशक पूर्व घर आंगन में चहकने, फुदकने वाली गौरैया अब कभी कभार ही नजर आती है। भारतीय वन्यजीव संस्थान के पक्षी विज्ञानियों की मानें तो घर-घर में बहुतायत में पाई जाने वाली गौरैया शहरों में तो तेजी से कम हुई है।

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विश्व गौरेया दिवस : गौरैया को लेकर लोगों की जागरूकता में हो रहा इजाफा, घरों में बना रहे घोंसले

हालांकि, सुकून देने वाली बात यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में गौरैया की संख्या में खास गिरावट नहीं आई है। स्टेट ऑफ इंडिया बर्ड रिपोर्ट के मुताबिक गौरैया शहरों में तो कम हो रही है, लेकिन अभी स्थिति बहुत अधिक चिंताजनक नहीं है। अब भी देश के तमाम राज्यों में मैदान से लेकर उच्च हिमालई क्षेत्रों तक गौरैया पाई जाती है।
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भारतीय उपमहाद्वीप में छह प्रजातियां 

भारतीय वन्यजीव संस्थान के पक्षी विज्ञानी डॉ. सुरेश कुमार के मुताबिक भारतीय उपमहाद्वीप में गौरैया की छह प्रजातियां पाई जाती हैं। इसमें यूरेशियन ट्री स्पैरो, रसेट स्पैरो, हाउस चेस्ट नेक्स्ट स्पैरो, चेस्टनेट सोल्डर स्पैरो, एलो थ्रोट स्पैरो शामिल हैं। ये प्रजातियां भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यामांर, श्रीलंका, नेपाल समेत तमाम देशों में पाई जाती हैं।

पक्षी विज्ञानियों की मानें तो गौरैया ही एकमात्र पक्षी है जो दुनिया के तमाम देशों में पाया जाता है। वैज्ञानिकों के मुताबिक अंटार्कटिका और आर्कटिक को छोड़कर गौरैया दुनिया के सभी देशों में पाई जाती है। 

1850 में दक्षिण अफ्रीका से अमेरिका, मेक्सिको पहुंची थी गौरैया 

भारतीय वन्यजीव संस्थान के वैज्ञानिकों के मुताबिक गौरैया अमेरिका और मेक्सिको जैसे देशों में नहीं पाई जाती थी। लेकिन साल 1850 में गौरैया को दक्षिण अफ्रीका से अमेरिका पहुंचाया गया, जहां डेढ़ सौ साल में गौरैया पूरे अमेरिकी महाद्वीप में फैल गई।

इंसानों से घुलमिल जाती है गौरैया 

पक्षी विज्ञानियों के अनुसार गौरैया ही एकमात्र पक्षी है जो इंसानों के सबसे अधिक करीब है। इंसानों के बगैर गौरैया रह ही नहीं सकती। पक्षी विज्ञानियों के शोध में यह बात सामने आई है कि इंसानों ने जिस इलाके से पलायन किया, वहां से गौरैया भी पलायन कर गई।


 

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यूरोपीय देशों में तेजी से गिर रही संख्या 

पक्षी विज्ञानियों की मानें तो भारतीय उपमहाद्वीप के देशों की तुलना में यूरोपीय देशों में गौरैया की संख्या बहुत अधिक तेजी से गिर रही है। पक्षी विज्ञानी तेजी से बढ़ते औद्योगीकरण, वायु प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण को इसके लिए जिम्मेदार मानते हैं। वैज्ञानिकों की मानें तो कृषि उत्पादन में अत्यधिक रासायनिक तत्वों के इस्तेमाल से भी गौरैया की संख्या में कमी आई है।

विशेषज्ञों की टीम करेगी अध्ययन 

उत्तराखंड में गौरैया को संरक्षित करने के लिए भारतीय वन्यजीव संस्थान और वन विभाग के विशेषज्ञों की टीम संयुक्त रूप से तमाम पहलुओं पर अध्ययन करेगी। पक्षी विज्ञानी डॉ. सुरेश कुमार के मुताबिक गौरैया को लेकर प्रस्तावित अध्ययन में उनके रहन-सहन और संख्या में आए बदलाव पर अध्ययन किया जाएगा।

2010 में शुरू हुआ था गौरैया दिवस 

दुनिया में पहली बार गौरैया दिवस 20 मार्च 2010 को मनाया गया था। गौरैया पक्षी के संरक्षण को लेकर दिल्ली सरकार ने तो साल 2012 में इस पक्षी को राज्य पक्षी का भी दर्जा दे दिया था। उधर, भारतीय डाक विभाग ने नौ जुलाई 2010 को गौरैया पर डाक टिकट जारी किया था।

आओ गौरैया को मिलकर बचाएं 

घर आंगन में चहकने, फुदकने वाली गौरैया कहीं विलुुप्त न हो जाए, इसके लिए सभी को पहल करनी होगी। गौरैया दोबारा हमारे घर आंगन में चहके इसके लिए घर आंगन में न सिर्फ अनाज डाले वरन आंगन में मिट्टी से बने बर्तन में पानी भी रखें। घर में आंगन न हो तो छतों पर अनाज डालें और साथ में पानी रखें। गौरैया के लिए घोंसले लगाएं। घर के आसपास जमीन खाली हो तो पेड़ पौधे लगाएं ताकि गौरैया अपना घोंसला बना सके। 

देश दुनिया के शहरों में गौरैया तेजी से विलुप्त हो रही है, जो चिंता का विषय है। राहत बात यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में गौरैया की संख्या अब भी पर्याप्त है। प्रत्येक व्यक्ति को गौरैया के संरक्षण को लेकर जागरूक होना होगा। गौरैया महज एक पक्षी नहीं है, बल्कि हमारे जीवन का अभिन्न अंग है। गौरैया के संरक्षण के लिए वन विभाग के विशेषज्ञों की मदद से अभियान चलाया जाएगा। 
-डॉ. सुरेश कुमार, वरिष्ठ पक्षी विज्ञानी, भारतीय वन्यजीव संस्थान
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