राज्य में सड़क समेत अन्य विकास कार्यों के लिए वन भूमि हस्तांतरण लगातार हो रहा है, जिससे हरियाली पर असर पड़ रहा है। साथ ही क्षतिपूरक वनीकरण के लिए लगाए जा रहे पौधे अगर सुरक्षित बचे तो उनको तैयार होने में वर्षों लगेंगे। वहीं, फाॅरेस्ट सर्वे आफ इंडिया की रिपोर्ट में भी सात जिलों में सैकड़ों हेक्टेयर क्षेत्रफल में वन कम होने का उल्लेख किया गया है।
राज्य बनने के बाद से प्रदेश में वर्ष 2024 तक 44,000 हेक्टेयर से अधिक वन भूमि का हस्तांतरण विभिन्न विकास योजनाओं के लिए किया गया। वन भूमि हस्तांतरण के साथ ही अगर एक हेक्टेयर में औसतन 200 परिपक्व पेड़ों का हिसाब लगाया जाए, तो 88 लाख वृक्ष कम हुए होंगे।
इसके अलावा हजारों हेक्टेयर में वन भूमि पर कब्जा होने और लीज पर वन भूमि दिए जाने के कारण भी वन क्षेत्रों की स्थिति बदली है। इसके बाद भी दो सौ हेक्टेयर अधिक क्षेत्रफल में वन संपदा को नुकसान हो चुका है। फाॅरेस्ट सर्वे आफ इंडिया ने पिछले साल वन आवरण को लेकर रिपोर्ट जारी की थी, इसमें बागेश्वर, चमोली, चंपावत, हरिद्वार, रुद्रप्रयाग, ऊधमसिंह नगर और उत्तरकाशी में वनों का क्षेत्रफल कम होने का जिक्र किया गया है।
क्षतिपूरक वनीकरण के जरिए भरपाई की कोशिश
देहरादून। वन विभाग वन भूमि हस्तांतरण के बदले दो गुनी भूमि पर प्लांटेशन का काम करता है। प्रतिकरात्मक वन रोपण निधि प्रबंधन एवं योजना प्राधिकरण (कैंपा) के माध्यम से क्षतिपूरक वनीकरण किया जाता है। इसी के तहत वर्ष-2024-2025 में करीब 1175 हेक्टेयर क्षेत्रफल में क्षतिपूरक वनीकरण के तहत 1292934 पौधे लगाए गए। इसके अलावा वन विभाग अन्य योजनाओं के माध्यम से भी पौधरोपण का काम करता है।
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विकास योजनाएं भी जरूरी है, इन योजनाओं के माध्यम से रोजगार भी सृजित होता हैं। काफी परीक्षण के बाद भी वन भूमि का हस्तांतरण होता है। इसके बदले दो गुनी भूमि पर पौधों को लगाया जाता है। सिटी फारेस्ट, मियावाकी माध्यम से भी प्रयास किए जा रहे हैं। लोग भी पपीता, आंवला जैसी प्रजाति को लगा सकते हैं, इससे आक्सीजन के साथ फल भी मिलेगा। -रंजन मिश्रा, पीसीसीएफ व नोडल अधिकारी वन भूमि हस्तांतरण