ट्री लाइन क्या है
किसी क्षेत्र में ट्री लाइन या वृक्ष रेखाएं, पर्यावास की वो सीमा होती हैं, जिसके पार पर्यावरण की विषम परिस्थितियों जैसे बहुत कम तापमान, अपर्याप्त वायु दाब या आर्द्रता की कमी के चलते पेड़ उग पाने में असमर्थ होते हैं। ट्री लाइन को एक ऐसी कृत्रिम सीमा के रूप में समझ सकते हैं, जिसके पार पेड़ों का विकास अवरुद्ध हो जाता है। इसके आगे वो अक्सर घनी झाड़ियों के रूप में ही उगते हैं।
फायदा या नुकसान
अभी यह स्पष्ट नहीं है कि ट्री लाइन के ऊपर शिफ्ट होने के क्या प्रभाव होंगे। लेकिन पहाड़ों पर अत्यधिक ऊंचाई पर जहां पहले पेड़ नहीं होते थे वहां भी इनका विस्तार होगा। यह फायदेमंद लग सकता है क्योंकि ज्यादा पेड़ों का मतलब है कि वातावरण से अधिक कार्बन डाइऑक्साइड को सोख लिया जाएगा।
इसके साथ ही इसकी वजह से कुछ प्रजातियों में भी विस्तार हो सकता है। लेकिन दूसरी तरफ इस वजह से ऊंचाई पर मौजूद टुंड्रा क्षेत्र घट जाएगा, जिससे ठंडे वातावरण वाले बुग्याल यानी अल्पाइन घास के मैदानों का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। यह क्षेत्र न केवल मवेशियों के लिए चरागाह के रूप में उपयोग किए जाते हैं, बल्कि अपने अंदर एक अलग इकोसिस्टम को समेटे हुए हैं। ऐसे में यदि यह नष्ट होते हैं तो इनके साथ इनमें मौजूद दुर्लभ वनस्पतियां, जैवविविधता और अन्य जड़ी बूटियां भी विलुप्त हो सकती हैं।
ट्री लाइन पीछे खिसकने और बुग्यालों में पेड़ उगने की वजह के बारे में हेप्रेक के वैज्ञानिक डॉ विजयकांत पुरोहित का कहना है कि कई बार निचले इलाकों के बीज उड़कर या अन्य वजहों से बुग्यालों में आ जाते हैं और अनुकूल वातावरण मिलने से उनके पौधे उगने लगते हैं। जैसे वैली आफ फ्लावर में पहले पेड़ नहीं थे अब देवदार उग रहे हैं। अभी तक बुग्यालों में भोजपत्र ही होते थे।
बुग्यालों में बढ़ा तापमान तो होगा नुकसान
गढ़वाल विश्वविद्यालय के हेप्रेक संस्थान के वैज्ञानिक डॉ विजयकांत पुरोहित का कहना है कि ट्री लाइन तेजी से पीछे खिसकेगी तो हिमालयी क्षेत्रों व बुग्यालों पर पेड़-पौधों का कब्जा हो जाएगा और गर्मी बढ़ती रही तो ग्लेशियरों के पिघलने का सिलसिला बढ़ेगा। उन्होंने बताया कि बुग्याल बर्फ गिरने पर फॉरेस्ट कवर का काम कर पानी को सोखते हैं। स्नो एरिया कम होने पर जमीन की नमी खत्म होने से पानी के स्रोत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। वहीं तमाम जड़ी बूटियों का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा, क्योंकि यह पौधे बुग्यालों की नर्म घास के साथ विकसित होते हैं। इससे कालाबांसा जैसे खरपतवार ऊपर आने से बुग्यालों की सुंदरता भी खत्म हो जाएगी।
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