दरअसल, हम प्राकृतिक आपदाओं, पर्यावरण परिवर्तन को अपने अनियोजित विकास के साथ जोड़कर नहीं देखते या बहस को उस तरफ नहीं ले जाना चाहते। इससे पक्ष और विपक्ष के सुर छिड़ जाते हैं। हमें नहीं भूलना चाहिए कि विकास और पर्यावरण दोनों ही मनुष्य और समाज के लिए ही हैं। दोनों को जोड़कर चलना ही अब हमारे हित में होगा। केदारनाथ त्रासदी हो या हालिया गैरसैंण या अल्मोड़ा में बादल फटने घटना हो, गर्मी-सर्दी का रुख बदलना हो तब तक हमारी समझ से दूर होंगे और हम हमेशा की तरह परिस्थितियों को बिगाड़ने में ही उतारू होंगे। यह समझ लेना जरूरी है कि विकास सुविधाओं का दूसरा नाम है, पर पर्यावरण पारिस्थितिकी सीधे प्राणों से जुड़ी है।
वैसे भी उत्तराखंड का पर्यावरण मात्र स्थानीय निवासियों के लिए ही नहीं बल्कि देश के लिए मायने रखता है क्योंकि यहां से पानी, मिट्टी, हवा देश को जिंदा रखती है। इसकी पारिस्थितिकी पर गहन चिंतन का भी समय है। अन्यथा साल 2013 में भगवान शिव ने केदारनाथ में जो भृकुटि तानी थी और फिर न जाने कब प्रभु एक बार और तांडव करेंगे, इसका पता नहीं। मतलब साफ है प्रकृति और प्रभु में कोई अंतर नहीं दोनों को चुनौती देने का मतलब अपने विनाश को निमंत्रण देना है।
देश-दुनिया में पर्यावरण में तेजी से हो रहा बदलाव चिंता का विषय है। विश्व पर्यावरण दिवस के मौके इस बार की थीम ‘बीट द एयर पॉल्यूशन’ है। ऐसे में हम सबको वायु प्रदूषण के प्रति सचेत होना होगा। वैसे तो देश-दुनिया की जैव विविधता व पर्यावरण के संरक्षण में उत्तराखंड का विशेष योगदान है। कार्बन स्टॉक को लेकर उत्तराखंड अहम भूमिका अदा करता है। केेंद्र व राज्य सरकार के स्तर पर पर्यावरण संरक्षण को लेकर तमाम योजनाएं संचालित की जा रही हैं, लेकिन आमजन की सहभागिता के बगैर बढ़ते पर्यावरण प्रदूषण पर नियंत्रण नहीं किया जा सकता है।
- डॉ. हरक सिंह रावत, वन मंत्री, उत्तराखंड सरकार
पर्यावरण को लेकर जिन तरीके से पूरी दुनिया में खतरा मंडरा रहा है। उसे देखते हुए पर्यावरण संरक्षण को लेकर और अधिक संवेदनशील होने की जरूरत है। पर्यावरण संरक्षण महज सरकारी तंत्र के भरोसे नहीं रहा जा सकता है। इसके लिए समाज के हर वर्ग के लोगों को जागरूक होगा। पर्यावरण संरक्षण को लेकर समय रहते नहीं चेते तो आने वाली पीढ़ियाें के आगे गंभीर संकट होगा।
- आनंदवर्धन, प्रमुख सचिव, वन एवं पर्यावरण
उत्तराखंड ही नहीं देश-दुनिया में पर्यावरण की स्थिति साल दर साल खराब हो रही है। पर्यावरण संरक्षण को लेकर पूरी दुनिया में चर्चा तो हो रही है, लेकिन योजनाओं को धरातल पर नहीं उतारा जा रहा है। पर्यावरण को यदि संरक्षित करना है तो इसके लिए हरेक व्यक्ति को अपने स्तर पर पहल करनी होगी। वरना वह दिन दूर नहीं जब मानव का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा।
- अनूप नौटियाल, संस्थापक, गति फाउंडेशन