अतीत का यह अनुभव और हाल ही बाल आयोग और महिला सशक्तिकरण परिषद की उपाध्यक्ष विजयलक्ष्मी गुसाईं का अमर उजाला रिपोर्टर को मामले से दूर रहने के लिए समझाने से जो आशंका उठी थी कि इस मामले को दबाने के लिए कुछ भी हो सकता है, शुक्रवार को यही हुआ। बड़ी संख्या में उग्र संवासिनियों का हंगामा एकदम प्रायोजित नजर आया।
जांच टीम के शुक्रवार को नारी निकेतन पहुंचने पर जो नजारा पेश आया, वह काबिले गौर है। जिन संवासिनियों को शायद ही कभी अखबार देखना नसीब होता हो, शुक्रवार को उनके हाथों में एक नहीं अमर उजाला की कई प्रतियां नजर आई। उनके हाथों तक अमर उजाला किसने पहुंचाया? किसने संवासिनियों को समझाया कि मीडिया उन्हें बदनाम करने की कोशिश कर रहा है?
पथराव के लिए पत्थरों को कैंपस में किसने जुटाया? यहीं नहीं कुछ संवासिनियों ने छत पर स्पीकर बॉक्स लगाकर नारेबाजी करने की कोशिश की। यह सब तैयारी किसने करवाई? अगर निष्पक्ष जांच हो जाती और यह स्पष्ट हो जाता कि नारी निकेतन में सब ठीक चल रहा है तो, फिर बदनामी का तो सवाल ही खत्म हो जाता, फिर यह जांच किसने प्रभावित करने की कोशिश की?
नारकीय जीवन जी रहीं संवासिनियों को इस जांच से यह तो फायदा होता ही कि निकेतन में प्रशासनिक रूप से जो गड़बड़ियां हैं, वे ठीक हो जाती, फिर उन्हें किसने गुमराह किया? ये सवाल साफ संकेत करते हैं कि कुछ लोग हैं, जो नहीं चाहते कि जांच हो। शायद उन्हें भय हैं कि निष्पक्ष जांच हुई तो सच सामने आ जाएगा।
सच्चाई सामने लाने से ज्यादा छवि की चिंता
ऐसे गंभीर मामले पर जांच के लिए प्रशासन ने कोई ठोस रणनीति तैयार नहीं की और स्पॉट वेरीफिकेशन करने के तर्ज पर जांच टीम नारी निकेतन पहुंच गई और हो-हल्ले-पथराव में जांच नहीं हो सकी।
इस मामले में यह भी सवाल उठ रहा है कि क्या महज नारी निकेतन में जाकर संवासिनियों से पूछताछ से सच सामने आ जाएगा? इस मामले की निष्पक्षता में प्रशासनिक मानसिकता भी आड़े आ रही है। दरअसल शुक्रवार को सरकार के खैरख्वाह अधिकारियों और नेताओं को बस यही चिंता सताती रही कि इससे सरकार की बदनामी हो रही है।
प्रशासनिक हल्के में कुछ जिम्मेदार अधिकारी इस पर सलाह-मशविरा करते नजर आए कि इस घटना से सरकार की छवि पर
पहले भी सवालों के घेरे में रहा है नारी निकेतन।
पहले भी नारी निकेतन पर उठते रहे हैं सवाल
नारी निकेतन लंबे समय से सवालों के घेरे में है। अतीत का अनुभव यह रहा है कि गंभीर आरोप के बाद भी हर बार जांच के नाम पर लीपापोती होती रही। हाल ही 25 के करीब संवासिनी के रिकार्ड गायब करने के मामले में काफी हंगामा मचा था। यह संवासिनी कहां गई, यह पता नहीं चल पाया है।
हालांकि नारी निकेतन प्रशासन यही कहता रहा कि उन्हें परिजनों की सुपुर्दगी में दिया गया है। महिला आयोग ने इस मामले में जांच कर अपनी रिपोर्ट सरकार को दी थी, लेकिन अभी तक गुत्थी सुलझ नहीं पाई है। एक पति ने पत्नी को देह व्यापार में सक्रिय शख्स की सुपुर्दगी में देने का आरोप लगाते हुए एसएसपी से शिकायत की थी, लेकिन कुछ हाथ नहीं लगा।
नारी निकेतन से संवासिनी के फरार हो जाने के मामले में तत्कालीन अधीक्षका सरला रावत को हटा दिया गया था। अब शोषण और गर्भपात के आरोप ने नारी निकेतन की पूरी व्यवस्था को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है।
मामले की तह तक जाएंगे
नारी निकेतन में हंगामे के चलते टीम पूरी तरह से जांच नहीं कर सकी, टीम को पुन: जांच के लिए भेजा जाएगा और मामले की तह तक पहुंचा जाएगा।
-रविनाथ रमन, डीएम देहरादून
नारी निकेतन का सारा स्टाफ बदला जाए
बाल आयोग की उपाध्यक्ष ने मुख्यमंत्री को अपनी जांच रिपोर्ट सौंप दी है। इस रिपोर्ट में उन्होंने नारी निकेतन का पूरा स्टाफ बदले जाने के साथ ही वहां सीसी टीवी कैमरे लगाए जाने की मांग की है। मुख्यमंत्री हरीश रावत उपाध्यक्ष को इस मामले में सभी व्यवस्था मुकम्मल करने का आश्वासन दिया है।
नारी निकेतन में संवासिनियों के शोषण का आरोप सामने आने के बाद महिला सशक्तिकरण परिषद और बाल आयोग की उपाध्यक्ष विजय लक्ष्मी गुसाईं ने हकीकत जाननी चाही। उन्होंने नारी निकेतन में जब संवासिनियों से बात की तो उन्होंने अपनी परेशानी बताई। इसके बाद विजय लक्ष्मी गुसाईं ने अपनी जांच रिपोर्ट मुख्यमंत्री को सौंप दी है।
उन्होंने बताया कि सीएम को भेजी रिपोर्ट में संवासिनियों से नारी निकेतन में जो व्यवहार किया जाता है। रिपोर्ट में स्थाई अधीक्षक और वार्डन दिए जाने की मांग की है। शोषण की बात पूछी तो उन्होंने बताया कि इस मामले में ताजी रिपोर्ट में कुछ नहीं है।