हिमालयी क्षेत्र में बदलते पर्यावरण से यहां पैदा होने वाली जड़ी-बूटियां अपना औषधीय प्रभाव खो रही हैं।
इसका खुलासा जीबी पंत हिमालयी पर्यावरण एवं विकास संस्थान के वैज्ञानिकों के शोध में हुआ है। विशेषज्ञों का कहना है कि जड़ी बूटियां 30 से 40 फीसदी औषधीय प्रभाव खो चुकी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जल्द ही प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आयुर्वेद चिकित्सा पर गहरा संकट आ सकता है।
जीबी पंत हिमालयी पर्यावरण व विकास संस्थान के विशेषज्ञ वर्ष 2007 से जड़ी बूटियों पर शोध कर रहे हैं। संस्थान के डा. प्रकाश फोंदणी का कहना है कि संस्थान ने करीब 15 औषधीय जड़ी बूटियों पर शोध किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालयी क्षेत्र के जलवायु में हो रहे परिवर्तन से जड़ी बूटियों का जीवन चक्र प्रभावित हुआ है।
इससे उनकी रासायनिक संरचना परिवर्तित हो रही है। डा. फोंदणी बताते हैं कि रासायनिक संरचना परिवर्तित होने से जड़ी बूटियां अपना औषधीय प्रभाव 30 से 40 फीसदी खो चुकी हैं। विशेषज्ञो ने अतीश, कुटकी, बालछढ़ी सतावर, हत्थाजड़ी, जटामासी, चंद्रा, कूट, ब्रह्म कमल, चिरायता व वनककड़ी आदि औषधियुक्त जड़ी बूटियों पर शोध किया है।
यह जड़ी बूटियां सामान्य बीमारियों से लेकर कैंसर, मधुमेह, सर्पदंश, डायरिया जैसे गंभीर रोगों के उपचार में प्रयोग की जाती हैं। संस्थान के प्रभारी वैज्ञानिक डा. आरके मैखुरी का कहना है कि हिमालयी जलवायु परिवर्तन को गंभीरता से नहीं लिया तो आयुर्वेद चिकित्सा के लिए संकट हो सकता है।