ग्रामीणों के प्रयास से तैयार एक टैंक ने पूरे गांव की तस्वीर बदल दी। करीब 18 साल पहले करीब दो लाख रुपये की लागत से बनाए गए इस टैंक के जरिये आज भी पूरे गांव की सिंचाई आवश्यकताओं की पूर्ति हो रही है। इससे कभी खेती छोड़ने को मजबूर रहे किसान आज न केवल आत्मनिर्भर बन चुके हैं, बल्कि अनाज बेचकर पैसा भी कमा रहे हैं।
रायपुर के कालीमाटी गांव में सिंचाई की व्यवस्था न होने के कारण खेती असिंचित और पूरी तरह बारिश पर निर्भर थी। उत्पादन न होने के कारण लोग खेती छोड़ रहे थे। तब 1995-96 में भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान ने ग्राम संपर्क परियोजना के अंतर्गत किसानों को गोद लिया।
1998 में संस्थान ने ग्रामीणों की मदद से एक टैंक का निर्माण किया। तब एक लाख 97 हजार 927 रुपये की लागत से तैयार टैंक के लिए 72 किसान परिवारों ने 68,715 रुपये जोड़े थे। भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान के विभागाध्यक्ष मानव संसाधन डॉ. लाखन सिंह ने बताया कि ग्रामीणों ने सभी क्षेत्रों में सिंचाई प्रबंधन की व्यवस्था बनाई।
किसानों की सहयोग राशि से काम करती है समिति
water tank
- फोटो : AmarUjala
इसके लिए उन्होंने एक जल प्रबंधन समिति गठित की। सिंचाई की व्यवस्था, टैंक की मरम्मत और पानी के वंटवारे का काम यही समिति करती है। साल में एक बार सभी किसान समिति को सहयोग के रूप में कुछ धनराशि देते हैं।
जन सहभागिता आधारित विकसित प्रणाली पर ग्रामीण पिछले 18 वर्षों से सफलतापूर्वक से समिति चला रहे हैं। सिंचाई की समुचित व्यवस्था होने के बाद किसान पर्याप्त मात्रा में अनाज, तिलहन, दलहन, सब्जी के साथ ही पशुओं के लिए चारा भी उगा रहे हैं।
इनका है कहना
कालीमाटी गांव में एक टैंक से सिंचाई की जो बेहतर व्यवस्था बनी है, यह अन्य सभी क्षेत्रों के लिए उदाहरण है। कम खर्च, बेहतर जल प्रबंधन, जनसहभागिता जैसे प्रयासों से ग्रामीणों ने खुद को मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया है।
-डॉ. लाखन सिंह, विभागाध्यक्ष, मानव संसाधन