उत्तराखंड में जल्द ही पानी को बर्बाद करने वालों को किसी न किसी रूप में इसकी भरपाई भी करनी होगी। भू जल का उपयोग करने वालों को टैक्स देना होगा और बिल्डिंग सहित अन्य निर्माण करने वालों को अनिवार्य रूप से भू-जल को रिचार्ज करने की व्यवस्था करनी होगी। यह सब होगा प्रदेश की नई जल नीति के लागू होने पर। जल नीति पर सरकार ने होमवर्क पूरा कर लिया है और इसके ड्राफ्ट को जल्द ही कैबिनेट में लाया जाएगा।
उत्तराखंड में अभी कोई जल नीति नहीं है। इस वजह से प्रदेश सरकार पानी के उपयोग को टैक्स के दायरे में भी नहीं ला पा रही है। पानी की कीमत को समझते हुए अब तैयार किए गए ड्राफ्ट में जल के समग्र उपयोग को ध्यान में रखते हुए संरक्षण और संवर्द्धन की व्यापक कोशिश की गई है। प्रदेश में अभी तक उत्तराखंड जल प्रबंधन एवं नियमन अधिनियम 2013 ही लागू है। इसमें भी नौलों और धारों की कोई बात नहीं की गई है। इस कमी को जल नीति में दूर किया जा रहा है। इससे पहले 2008 में जल नीति एवं जल संरक्षण पर रुड़की आईटीआई ने भी ड्राफ्ट तैयार किया था। शासन के सूत्रों के मुताबिक जल नीति पर विभागों के सुझाव लिए जा रहे हैं। यह काम लगभग पूरा हो चुका है।
ये महत्वूपर्ण बातें हैं ड्राफ्ट में
- पानी के उपयोग को लेकर सख्त रुख अपनाया जा सकता है। ड्राफ्ट में इसके लिए दंड का प्रावधान भी रखा गया है। इस पर सरकार की ओर से बाद में अलग से दिशा निर्देश भी जारी किए जा सकते हैं।
- वर्तमान में भूजल के उपयोग को लेकर कोई ठोस व्यवस्था नहीं है। भूजल के उपयोग को कर के दायरे में लाया जा रहा है। इसके लिए अलग से नियमावली की जरूरत पड़ी तो वह भी लाई जाएगी।
- भवन और अन्य निर्माण करने वालों के लिए भूजल रिचार्ज की व्यवस्था करना अनिवार्य होगा।
- प्राकृतिक जल स्रोत जैसे नौलों, धारों आदि का संरक्षण और संवर्द्धन करना भी सरकार और अन्य संस्थाओं के लिए अनिवार्य होगा, प्रदेश में लागू वर्तमान व्यवस्था में इस संदर्भ मेें कोई प्रावधान नहीं हैं।
- प्रदेश में मानसून की बारिश का सारा पानी उपयोग में नहीं आ पाता। इसके लिए रुफ टॉप हार्वेस्टिंग सिस्टम को नए निर्माण में अनिवार्य किया जा सकता है। वर्तमान में सरकारी इमारतों में यह व्यवस्था करने की बात सरकार कर चुकी है। सिंचाई विभाग ने अपने कार्यालयों के लिए यह तय भी कर लिया है।
- नदियों और अन्य प्राकृतिक स्रोतों का पुनर्जीवन करना सरकार का दायित्व होगा, इसमें जन सहभागिता भी होगी।
- इसके अलावा चाल खाल, आद्र भूमि या वैटलैंड, प्राकृतिक जलस्रोतों के रिचार्ज जोन, जल संग्रहण क्षेत्र आदि के संरक्षण के लिए भी प्रावधान किए गए हैं।
- हर जिले में जल प्रबंध समिति का गठन होगा। वाटर डाटाबेस मैनेजमेंट सिस्टम तैयार होगा और आम लोगों की इस तक पहुंच होगी।
क्या है वर्तमान स्थिति.....
प्रदेश में 2.6 लाख प्राकृतिक जल स्रोत हैं। जलवायु परिवर्तन और अन्य कारणों से करीब 12 हजार स्रोत सूख गए हैं। प्रदेश में 90 प्रतिशत जलापूर्ति भी इन्हीं के भरोसे हैं। प्रदेश में 16973 गांवों में से 594 गांव पेयजल के लिए प्राकृतिक जल स्रोतों पर ही निर्भर हैं। करीब 50 प्रतिशत शहरी क्षेत्र किसी न किसी रूप में जल संकट से जूझ रहा है।
सरकार दबाव में
नीति आयोग की ओर से जारी वाटर मैनेजमेंट इंडेक्स 2018 में जल प्रबंधन के मामले में प्रदेश का प्रदर्शन बेहद खराब रहा है। नीति आयोग ने पाया कि प्रदेश की कोई जल नीति नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में पानी की भारी कमी है और प्रदेश में वाटर डाटा सेंटर भी नहीं है। आयोग अब आठ अगस्त को प्रदेश की ओर से की गई कोशिश की समीक्षा करेगा।
जल नीति का ड्राफ्ट तैयार कर लिया गया है। जल्द ही इसे मंत्रिमंडल के समक्ष रखा जाएगा। जल संरक्षण को लेकर केंद्र के साथ ही राज्य सरकार भी गंभीर है।
- अमित नेगी, सचिव वित्त एवं नियोजन