बेबाकी, अक्खड़पन, साफगोई की राह चलने वाले वरिष्ठ भाजपा नेता व देहरादून के महापौर विनोद चमोली का सियासी अनुभव तीन दशक से अधिक समय का है, लेकिन राजनीति में प्रवेश के पीछे एक रोचक किस्सा है।
1985 में देहरादून में एक सीरियल किलर कई बच्चियों के साथ दुष्कर्म कर उनकी हत्या कर रहा था। नेहरू कालोनी क्षेत्र में चमोली के करीबी परिचित की बच्ची के साथ भी ऐसा हुआ। विरोध में चमोली ने एलान कर दिया कि 14 नवंबर को बाल दिवस नहीं मनाया जाएगा। वैसा ही हुआ। इस आंदोलन के चलते उन्हें भाजपा युवा मोर्चा में पद मिला। उनके बारे में आम धारणा है कि चमोली को दोस्त से अधिक दुश्मन बनाने का शौक है। कभी अपनी ही पार्टी के कार्यकर्ताओं को हड़काने तो कभी कांग्रेसी सीएम के साथ कथित करीबी के चलते वे चर्चा में बने रहते हैं। 1987 में वे बतौर सभासद पहले नगरपालिका चेयरमैन बने, फिर दो बार से महापौर हैं। चमोली अब विधानसभा चुनाव से नई पारी खेलने की तैयारी में हैं। अपने तीखे मिजाज, सीएम से नजदीकी, पार्टी लाइन और सियासी भविष्य को लेकर उन्होंने अमर उजाला संवाददाता गौरव मिश्रा से मन की बात साझा की....
सवाल: इनदिनों आपकी मुख्यमंत्री हरीश रावत से घनिष्ठता बढ़ गई है। ऐसा क्यों?
- मेरी हर उस व्यक्ति से अच्छी निभती है जो सकारात्मक होता है। जनहित में मैं हर उस शख्स का सहयोग करता हूं जो मेरे काम के प्रति पॉजिटिव हो। तमाम मसलों पर सीएम का रवैया सकारात्मक रहा है। व्यक्तिगत आदर देना शिष्टाचार और संस्कृति का हिस्सा है। मुख्यमंत्री बहुत अच्छी बातें करते हैं, इसलिए भी वे मुझे अच्छे लगते हैं, लेकिन मुख्यमंत्री जी की प्रशासनिक क्षमताएं बेहद कमजोर हैं। कुछ समय पहले उन्होंने कहा था कि उनकी फाइलें धूल फांक रही हैं, जब उनकी फाइलों का यह हाल है तो मेरी फाइलों की क्या औकात? प्रदेश में नौकरशाही इतनी हावी है कि मुख्यमंत्री की घोषणाओं पर 10 फीसदी भी अमल नहीं हो रहा है।
सवाल: चर्चा है कि आप कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ सकते हैं?
- हर बात में राजनीति निहितार्थ निकालना ठीक नहीं, लेकिन शीशमबाड़ा प्रोसेसिंग प्लांट पर मुख्यमंत्री जी कांग्रेसी नेताओं व माफियाओं के दबाव में आ गए। इस पर मैंने उनका कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा भी कि आपसे यह उम्मीद नहीं थी। लेकिन मेरे लिए जनहित सबसे ऊपर है। जहां तक कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने की बात है तो मेरे जीवन में, मेरी राजनीति में चुनाव बहुत बड़ी जरूरत नहीं है। जीवन का सदुपयोग होना चाहिए। मैं स्वयं में भाजपा को देखता हूं। भाजपा के लिए एक क्या दस चुनाव तक कुर्बान कर सकता हूं। मैंने कई चुनाव छोड़े भी हैं।
सवाल: आपअपने मिजाज को लेकर सुर्खियों में रहते हैं। आपको इतना गुस्सा क्यों आता है?
- गलत। मैं बेहद सरल, सहज और उदारमना व्यक्ति हूं। असल में मैं गरम मिजाज हूं ही नहीं। एक बात और साफ कर दूं कि यह लोक धारणा नहीं है। कुछ लोगों का दुष्प्रचार व कम्युनिकेशन गैप से उपजी भ्रामक सोच है। कुछ नियम, सिद्धांत, आदर्श मेरी सांस की तरह हैं। उनसे मैं कभी भी समझौता नहीं करुंगा। अगर कोई अपनी सुपरमेसी मुझपर थोपने की कोशिश करता है, अपने अहंकार, अपने स्वार्थ को मुझ पर लादने का प्रयास करता है तो मेरी आत्मा विद्रोह कर बैठती है। इस पर मैं कभी भी कंप्रोमाइज नहीं करूंगा। मैं अपने से किए कमिटमेंट्स पर जब तक जीवित हूं, टिका रहूंगा। मेरा स्वभाव ही मेरी सबसे बड़ी ताकत है।
सवाल: यह स्वभाव आपकी राजनीति के लिए फायदेमंद रहा या नुकसानदायक?
- मेरे स्वभाव से मुझे राजनीतिक क्षति बहुत हुई है। मेरे साथ वाले कार्यकर्ता व मुझसे जूनियर मुख्यमंत्री तक हो गए। पार्टी संगठन में ऊंचे ओहदेदार हो गए। लेकिन मैंने पहले दिन से सत्ता की, पॉवर की, ताकत और रसूख की राजनीति नहीं की। राजनीति मेरे लिए एक जरिया मात्र है। मुझे जनता ने पैदा किया, पार्टी संगठन ने मुझे निखारा, मुझे ऊंचाई दी। राजनीति में पूरी तरह से आजाद होकर, इंडिपेंडेंट होकर काम नहीं कर सकते। लेकिन मेरे लिए मेरे सिद्धांत, आदर्श सबसे ऊपर हैं।
सवाल: आप पर पार्टी लाइन की अनदेखी करने के साथ ही कार्यकर्ताओं के अपमान और उपेक्षा करने के भी आरोप है?
- मैं पार्टी लाइन से बाहर कभी नहीं गया और न ही कभी जाऊंगा। वैचारिक सैद्धांतिक मतभेद हो सकते हैं। व्यक्तिगत स्वार्थों के कारण कुछ लोग आरोप लगाते हैं कि मैं उनकी सुनता नहीं हूं। तो ऐसे लोगों की मैं कतई नहीं सुनूंगा। मैं पार्टी नेतृत्व के इर्द गिर्द भी नहीं घूमता। इस कारण मैसेज जाता है कि मैं पार्टी लाइन से अलग हूं। पार्टी के कार्यक्रमों में सीमित तौर पर ही शिरकत करता हूं। मैं अपने काम को अधिक समय देता हूं। इस समय मेयर के तौर पर अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करना मेरी प्राथमिकता है, लोगों के प्रति, दूनवासियों के प्रति मेरी जवाबदेही है। उदीयमान कार्यकर्ताओं को निखारने में जुटा रहता हूं। उन्हें प्यार करता हूं, इसलिए डांट भी देता हूं।
सवाल: भाजपा प्रदेशाध्यक्ष अजय भट्ट ने 10 बागी विधायकों को त्यागी बताया। आप क्या सोचते हैं?
- कांग्रेस के लिए वे बागी है-भाजपा के लिए त्यागी हैं। दोनों ही बातें आंशिक तौर पर सही हैं। उन्होंने एक साल की विधायकी छोड़ी है, इसलिए त्यागी तो वे हैं ही। लेकिन मेरी चिंता उससे बड़ी है। भाजपा का विचार, संस्कार व इसकी कार्य संस्कृति का हिस्सा ये बनेंगे या नहीं, इसको लेकर मैं चिंतित हूं। ये लोग भाजपा की विचारधारा और संस्कृति को कितना आत्मसात कर पाते है यह देखने वाली बात है। इसमें जरा भी कठिनाई आई तो भाजपा के लिए दिक्कत हो सकती हैं। हमें यह समझना होगा कि चुनाव में जनता ही चुनाव जिताती है, नेता नहीं। इसलिए हमें जनता को साधने की जरूरत है। मैं भाजपा का कांग्रेसीकरण नहीं होने दूंगा।
सवाल: आप दो बार के मेयर हैं, लेकिन देहरादून के लिए कुछ खास नहीं कर पाए?
- तंत्र के आगे मैं खुद को बेबस पाता हूं। यह जो सिस्टम है न, इसने मुझे बांध रखा है। हमारा तंत्र ही ऐसा है, खासकर उत्तराखंड का राजनीतिक-प्रशासनिक तंत्र। एक वाक्या सुनाता हूं। जब विजय बहुगुणा मुख्यमंत्री थे। संडे बाजार को लेकर बवाल चल रहा था। मैंने कड़ा स्टैंड लिया, लेकिन हुआ क्या। बहुगुणा जी के बेटे साकेत बहुगुणा मौके पर पहुंच जाते थे। पुलिस-प्रशासन व नगर निगम पर दबाब बनाते थे कि अतिक्रमणकारियों को मत हटाओ। ऐसे हजारों उदाहरण हैं। इसी तरह सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट पर थोड़ी की प्राइसिंग पर सरकार ने नकारात्मक रवैया अख्तियार कर लिया तो कंपनी ने हाथ खड़े कर दिए। लोक निर्माण विभाग, सिंचाई विभाग, नजूल समेत तमाम सरकारी जमीन पर कब्जे हो रहे हैं। पुलिस की नाक के नीचे यह सब हो रहा है। लेकिन सारी जिम्मेदारी नगर निगम पर डाल दी जाती है। नदियों पर नालों पर वर्तमान सरकार के मंत्री कब्जे करवा रहे हैं। इसके लिए भी क्या मैं जिम्मेदार हूं?
सवाल: तो क्या आप बिल्कुल शक्तिहीन हैं?
- मैं परेशान इसलिए भी हूं कि शक्तियां मेरे पास नहीं हैं। मुझे वाजिब ताकत मुहैया करा दी जाए और फिर मेरा काम देखा जाए। बिना ताकत के कैसे काम होगा?