पहाड़ को यदि विकास के रास्ते पर ले जाना है तो हमें पहाड़ी बनकर रहना होगा। पहाड़ के आदमी की तरह सोचें और काम किए बिना, पहाड़ के विकास की योजनाएं बनाने का कोई फायदा नहीं होगा। आज अंतिम व्यक्ति को केंद्र में रखकर योजनाएं बनाने की सख्त जरूरत है।
आरएस टोलिया फोरम के तहत पहाड़ के विकास और पलायन थामने के उपायों पर चर्चा करते हुए विशेषज्ञों ने यह राय रखी। पूर्व मुख्य सचिव एनएस नपलच्याल ने कहा कि डा. आरएस टोलिया पहाड़ के विकास पर विशेष जोर देते थे। टिकाऊ विकास के लिए वह अंतिम व्यक्ति तक केंद्रित योजनाएं बनाने पर जोर देते थे। पूर्व मुख्य सचिव डा. इंदु कुमार पांडे ने कहा कि कल्याणकारी व विकासवादी अर्थशास्त्र को जमीन पर उतारने वाले स्व. टोलिया के सपनों को साकार करने के लिए सरकारों को इस दिशा में गंभीरता से काम करना होगा। पूर्व मुख्य सचिव एन रविशंकर ने कहा कि पहाड़ के विकास के लिए वहां की परिस्थितियों के अनुकूल छोटी-छोटी योजनाओं को तैयार करना होगा।
यूकॉस्ट के महानिदेशक डा. राजेंद्र कुमार डोभाल ने कहा कि डा. टोलिया विभिन्न संस्थानों व लोगों को जोड़कर गरीबों के कल्याण पर बल देते थे। आज पहाड़ में नए ढंग से विकास कार्य करने की जरूरत है। कुमाऊं विवि के पूर्व कुलपति डा. बीके जोशी ने कहा कि हिमालयी राज्यों के बीच समन्वय से योजनाएं तैयार करने और क्रियान्वन में आसानी हुई है। उद्योग निदेशक सुधीर चंद्र नौटियाल ने कहा कि पहाड़ पर वहां के संसाधन आधारित छोटे उद्योग धंधे ज्यादा फायदेमंद साबित हुए हैं। पूर्व प्रमुख वन संरक्षक एसटीएस लेप्चा ने वन एवं पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए खेती व वन्य योजनाएं बनाने की आवश्यकता जताई। अनूप नौटियाल और बिनीता शाह ने कार्यक्रम का संचालन किया।
भारत में हिंदी आज भी दोयम दर्जे की भाषा मानी जाती है। खुद हिंदी से रोजगार पाने वाले लोग अंग्रेजी को आगे बढ़ा रहे हैं। जिन घरों में हिंदी के कारण चूल्हा जलता है, उनके बच्चे भी हिंदी छोड़कर अंग्रेजी की ओर बढ़ रहे हैं। यही हमारी राष्ट्रीय भाषा हिंदी का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है। वैली ऑफ वर्ड्स लिटरेचर फेस्टिवल में आयोजित ‘कारवां हिंदी का’ सत्र में वक्ताओं ने इस बात को लेकर चिंता जताई।
प्रख्यात साहित्यकार पुष्पा पुष्पिता अवस्थी ने हिंदी को भारतीय संस्कृति की भाषा बनाने पर जोर दिया। इस दौरान उन्होंने कहा कि भारत से ज्यादा विदेशों में हिंदी मजबूत हो रही है। क्योंकि यह हमारी संवेदना, सम्मान, अस्मिता और एकता से जुड़ी हुई है। प्रख्यात साहित्यकार डा. गोविंद मिश्र ने कहा कि आज हिंदी के आयोजनों में भाषा से जुड़े साहित्यकारों, लेखकों व कवियों को उसी तरह महत्व दिया जाता है, जैसे श्राद्ध में पंडों को। उन्होंने कहा कि हिंदी कभी भी किसी सरकार की प्राथमिकता में नहीं रही। जब तक हिंदुस्तान में गरीबी है, हिंदी को कोई हटा नहीं सकता। आज भी तथाकथित बड़े अधिकारियों और समाज की नजर में हिंदी गरीब व पिछड़ों की भाषा बनी हुई है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए साहित्यकार लक्ष्मी शंकर वाजपेयी ने कहा कि विदेश में रहने वाले भारतीय- जाति, धर्म, संप्रदाय, रंग, क्षेत्र के अंतर को भूलकर हिंदी में बात करते हैं। यही सम्मान हमें हिंदी के लिए भारत में भी पैदा करना होगा। डा. राकेश पांडे ने कहा कि आजादी के बाद हिंदी का कारवां तेजी से बढ़ा है। सिनेमा ने हिंदी को आगे बढ़ाने का काम तो किया, लेकिन बड़े स्तर पर रोजगार से नहीं जोड़ा गया, जैसी उम्मीद की जा रही थी।
संगीता गुप्ता ने कहा कि वक्त के साथ हिंदी सर्व समाज की भाषा बन रही है। देश-दुनिया में हिंदी के महत्व को समझते हुए भाषा को यथोचित सम्मान दिया जा रहा है। इंद्रजीत सिंह ने कहा कि सिनेमा के जरिये दक्षिण-उत्तर पूर्व के उन क्षेत्रों तक हिंदी की पहुंच बढ़ी है, जहां इनको बोलने और समझने वाले बेहद कम लोग हैं। धीरे-धीरे सरकारी कामकाज में अंग्रेजी के स्थान पर हिंदी का प्रयोग बढ़ रहा है।