19 जून 2014 को मेरे जन्मदिन पर सभी एक रेस्टोरेंट में मिले। 10 मिनट की मुलाकात में बस मुझे जन्मदिन की बधाई दी। एक गुलदस्ता दिया और हमने मिलकर हाफ नूडल्स खाए। मैं अपने बारे में दीप को लगभग सबकुछ बता चुकी थी। उन्होंने भी अपनी तरफ से सब बता दिया था।
जुलाई 2014 को मैं, मेरी मां और दीप, उनकी मां, भाई, भाभी, भतीजी एक रेस्टोरेंट में मिले। दीप के पिताजी अपनी ड्यूटी पर होने के कारण नहीं आ पाए। थोड़ी बातचीत और खाने के बाद हम अपने-अपने घरों को चले गए। शाम को दीप का फोन आया कि मां, भाई और भाभीजी को मैं पहली नजर में पसंद आ गई। सच में दिल फूला नहीं समां रहा था।
अब दीप के पिताजी से हरी झंडी मिलने का इंतजार था। 26 सितंबर को दीप के जन्मदिन पर हम फिर मिले। दीप ने बताया कि पिताजी का कहना है कि मेरे घर में कोई पुरुष (पिता नहीं थे) नहीं है, इसलिए शादी नहीं हो सकती। मन उदास रहने लगा।
फिर अचानक अक्तूबर 2014 में दीप का फोन आया कि पिताजी मान गए। मेरी खुशी का ठिकाना न रहा। पिताजी ने शर्त रखी थी कि जब तक उनका अपना घर नहीं बन जाएगा, तब तक शादी नहीं होगी। मैं सब्र के इस इम्तिहान के लिए तैयार थी। रजामंदी मिलने के बाद मई 2015 से हर रविवार हम दोनों मिलने दीप के प्लाट (जहां घर की नीव पड़ गई थी) जाने लगे। वर्ष 2016 फरवरी में घर बनकर लगभग तैयार हो गया था।
अगस्त 2016 में दीप, रिश्ते की बात लेकर अपने पूरे परिवार के साथ हमारे घर आए। वर्ष 2014 से डेढ़ साल बाद पिताजी को पहली बार सामने से देखा। शादी का समय तय हुआ 21 नवंबर 2016 और मेरे मामाजी ने मेरा कन्यादान करना स्वीकार किया। आज दीप के साथ शादी को भले ही तीन वर्ष हो गए हैं, लेकिन अभी भी लगता है जैसे कल ही की बात हो।
-रुचि बागड़ी, नेहरूग्राम, देहरादून