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पड़ोसी से सीख सकते थे राजनीतिक समझदारी

Sat, 09 Nov 2013 02:16 PM IST
अनूप वाजपेयी/ अमर उजाला, देहरादून
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उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियों के साथ-साथ यहां की राजनीतिक जमीन भी तेरह सालों में न जाने कितने झटके और हिचकोले खाने को मजबूर रही है।
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जबकि पड़ोसी और पर्वतीय राज्य हिमाचल से बहुत कुछ सीखा जा सकता था। हिमाचल में वही दोनों पार्टियां सक्रिय और सत्ता पर काबिज रही हैं जो उत्तराखंड में हैं।


हिमाचल में राजनीतिक परिपक्वता और स्थिरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 1951 के बाद 17 सालों तक राज्य की कमान यशवंत सिंह परमार के हाथों रही।

1972 में भौगोलिक तौर पर हिमाचल ने नए राज्य की शक्ल ली। तब से आज तक हिमाचल में नेतृत्व की बागडोर कांग्रेस में ठाकुर रामलाल के बाद वीरभद्र सिंह, भाजपा में शांता कुमार और प्रेम कुमार धूमल के इर्द-गिर्द ही रही है।
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जन्म के साथ्ा दांव-पेंच में उलझा
उत्तराखंड अपने जन्म के साथ ही राजनीतिक दांव-पेंच में उलझ गया। तेरह सालों में सात बार मुख्यमंत्रियों ने शपथ ली लेकिन अलग राज्य का सपना देखने वालों की आंखें विकास, खुशहाली और मूलभूत सुविधाओं के लिए पथरा गई हैं। राजनीतिक बिसात पर शह-मात के खेल में जुटे नेताओं ने सीमांत और पिछड़े राज्य को नई ऊंचाई देने की जगह उसे अस्थिरता और अनिश्चितता की ओर मोड़ दिया है।

आपसी खींचतान में उलझे
जिस उम्र में राज्य को आवश्यकता थी बेहतर सुनियोजित विकास और राजनीतिक परिपक्वता की, दोनों ही पार्टियां कांग्रेस-भाजपा प्रदेश को बेहतर विकल्प देने की बजाय आपसी खींचतान और कुर्सी के खेल में जुट गईं । कमोवेश प्रदेश के सातों मुख्यमंत्री और उनकी सरकारें राजनीतिक झंझावात में उलझी और उससे निपटती दिखीं।

पहले मुख्यमंत्री कुछ महीनों में ही निपटाया
प्रदेश केपहले मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी को राज्य की बागडोर सौंपने वालों ने ही कुछ महीनों में उन्हें चलता किया। बारी थी राज्य बनवाने में अगुवाकार रहे भाजपा नेता भगत सिंह कोश्यिारी की जिन्होंने मुख्यमंत्री की कुर्सी तो संभाली लेकिन लोगों को जरूरत थी एक अनुभवी मुख्यमंत्री की।

कांग्रेस सत्ता में आई और मुख्यमंत्री की कमान नारायण दत्त तिवारी के हाथों गई। विकास पुरुष यूपी वाला जलवा तो नहीं दिखा सके लेकिन नौकरशाही से काम लेने के अनुभव, तौर-तरीका और राजनीतिक कौशल ने नए प्रदेश को कुछ दिशा जरूर दी। अभी तक की बात करें तो अकेले तिवारी ने ही जैसे-तैसे पांच सालों का कार्यकाल पूरा किया है।

भाजपा को सौंपी सत्ता
उत्तराखंड के लोगों ने कांग्रेस को नकारा तो कुर्सी भाजपा के फौजी नेता मेजर भुवन चंद्र खंडूड़ी के हाथों पहुंची। फौज का अनुशासन देखने वाले खंडूड़ी के जमाने में उनकी पार्टी में जमकर अनुशासनहीनता बढ़ी। पार्टी ने करीब दो साल में ही मुख्यमंत्री की कमान रमेश पोखरियाल निशंक को सौंप दी।

‘खंडूड़ी जरूरी’ के नारे केसाथ चुनाव में उतरी भाजपा की जुगलबंदी उत्तराखंड के लोगों को पसंद नहीं आयी तो फिर कांग्रेस सत्ता में लौटी। मुख्यमंत्री के तौर पर विकास पुरुष की छवि रखने वाले हेमवंती नंदन बहुगुणा की समृद्ध राजनीतिक विरासत से जुड़े विजय बहुगुणा को पार्टी ने मौका दिया। पार्टी में जबरदस्त विरोध के बावजूद बहुगुणा मुख्यमंत्री तो बन गए लेकिन प्रदेश की सियासी फिजा में उनकी कुर्सी के लगातार हिचकोले खाने की खबरें आती रही हैं।

परिसीमन ने भी गणित गड़बड़ाया
जनसंख्या के आधार पर परिसीमन ने भी प्रदेश को राजनीतिक तौर पर मजबूत नहीं होने दिया है। तेरह जिलों वाले उत्तराखंड में विकास का पहिया चार शहरों देहरादून, हरिद्वार, नैनीताल और ऊधमसिंह नगर जिले में ही घूमा है। दूरस्थ और दुर्गम जिलों में विकास न होने से लोग निचले इलाकों में बसने को मजबूर हैं। वहीं राज्य के बाहर से आने वालों का फोकस भी इन्हीं जिलों तक है।
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सरकारों की योजनाएं और अधिकारियों मनपसंद तैनाती भी इन्हीं चार शहरों तक सिमटी है। आबादी के आधार राजनीतिक क्षेत्र का निर्धारण भी इस राज्य के लिए अभिशाप बना है। चार शहरों ने अंधाधुंध विकास तो किया लेकिन अब यही राज्य केलिए मुसीबत भी बनते जा रहे हैं। विकास के नाम पर इन जिलों में बेतरतीब निर्माण, अनियंत्रित यातायात, मूलभूत सुविधाओं की मारामारी और प्राकृतिक संपदा का जबरदस्त दोहन जारी है।
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