रिपोर्ट में सीधे नहीं कहा गया है कि आपदा प्रबंधन की तैयारी में कमी थी। सुझाव दिया गया है कि क्षेत्र में पूर्व चेतावनी तंत्र का विकास होना चाहिए। अधिक मौसम केंद्र होने चाहिए और लोगों को खतरे के प्रति आगाह करने का पूरा तंत्र होना चाहिए। साफ है कि यह सब न होने की वजह से क्षेत्र के लोग अचानक ही इस आपदा में घिर गए।
लोग भी कम जिम्मेदार नहीं
रिपोर्ट के मुताबिक संवेदनशील क्षेत्र में सेब के बगीचों का विस्तार किया गया। यहां पर मिट्टी को बांधे रखने के लिए गहरी जड़ों वाले पौधों का रोपण होना चाहिए था। यह भी पाया गया कि नालों और गदेरों के किनारे लोगों ने मकान बना लिए। सड़क निर्माण के कारण मलबे की मात्रा बढ़ गई। कमजोर पहाड़ियों वाले इलाकों में लोगों ने खेती की और आपदा के खतरों को नजरअंदाज किया।
आपदा के बाद हरकत में आया तंत्र
रिपोर्ट के मुताबिक आपदा के बाद प्रबंधन तंत्र ने 410 लोगों को रहने का ठिकाना उपलब्ध कराया। आराकोट में संचार स्टेशन स्थापित किया जा सका और एसडीआरएफ की सक्रियता दिखाई दी।