मेले में जाने की तैयारी कर रहे थे
भूपेंद्र ने संवाद न्यूज एजेंसी से बातचीत में बताया, हम खीरगंगा के तेज बहाव के आदी थे, लेकिन इस बार जो भयानक रूप हमने देखा, वह तीन दिन बाद भी समझ से बाहर है। 5 अगस्त की दोपहर मैं गांव के अन्य लोगों के साथ होटल के बाहर खड़ा था। हम मेले में जाने की तैयारी कर रहे थे। तभी सामने मुखबा गांव से भागो-भागो की आवाजें और सीटियां सुनाई दीं।
यह सुनते ही हम पांच लोग तुरंत हर्षिल की ओर भागे और हमारे पीछे एक कार चालक भी अपनी जान बचाने के लिए तेजी से आगे बढ़ रहा था। बस दो या तीन सेकंड का फर्क था वरना हम भी उस प्रलय में कहीं खो गए होते। इसके बाद मैंने अपनी पत्नी और बच्चों को फोन किया और बताया कि मैं तो सुरक्षित हूं लेकिन सब कुछ खत्म हो गया। इसके बाद नेटवर्क भी चला गया।
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लगा जैसे मैं अपने ही लोगों पर बोझ बन गया हूं
भूपेंद्र पंवार ने बताया कि सब कुछ खोने के बाद तीसरे दिन भी गांव के अन्य लोगों ने खाना दिया। मेरे कपड़े मलबे में दब गए थे, इसलिए पहनने के लिए टी-शर्ट और पजामा भी दूसरों से मांगना पड़ा। ऐसा लग रहा था जैसे मैं अपने ही गांव के लोगों पर बोझ बन गया हूं। वहीं, उत्तरकाशी में मेरी पत्नी और बच्चे भी परेशान थे। मैं पैदल चलकर मुखबा पहुंचा और वहां से हेलिकॉप्टर के जरिये उत्तरकाशी आया।