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Uttarkashi Cloudburst: खीरगंगा के 2.51 लाख टन मलबे ने मचाई थी धराली में तबाही, अब भी खतरे में है हर्षिल

Wed, 10 Sep 2025 08:39 AM IST
रेनू सकलानी आफताब अजमत, अमर उजाला ब्यूरो, देहरादून

सार

पिछले महीने उत्तरकाशी के धराली में आई तबाही का कारण खीरगंगा का 2.51 लाख टन मलबा बना। धराली आपदा पर वैज्ञानिक समिति ने रिपोर्ट शासन को सौंपी हैं।

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उत्तरकाशी खीरगंगा - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
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उत्तरकाशी के धराली में पांच अगस्त को खेरा गाड (खीरगंगा) के 2,50,885 टन मलबे ने तबाही मचाई थी। हर्षिल अब भी खतरे में है। सचिव आईटी नितेश झा के निर्देश पर गठित वैज्ञानिक समिति ने इस आपदा की पहली रिपोर्ट सौंप दी है। विभिन्न वैज्ञानिक संस्थानों ने एकमत होकर बताया है कि ऊपर तेज बारिश से भूस्खलन बांध के टूटने के कारण यह आपदा आई।

धराली आपदा को लेकर बीते दिनों यूकॉस्ट के महानिदेशक प्रो. दुर्गेश पंत की अध्यक्षता में एक वैज्ञानिक समिति गठित हुई थी। इसमें आईआईआरएस, वाडिया के वैज्ञानिक भी शामिल थे। समिति ने लिडार सर्वे, एनडीआरएफ-एसडीआरएफ के ड्रोन सर्वे, स्थानीय लोगों से बातचीत, सेटेलाइट अध्ययन के बाद एक रिपोर्ट तैयार की है, जो कि इस आपदा की पहली वैज्ञानिक रिपोर्ट है।

कई स्थानों पर छोटे पैमाने पर लैंडस्लाइड डेम आउटबर्स्ट फ्लड हुए उत्पन्न

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समिति ने बताया है कि ऊंचाई वाले क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा के कारण ये तबाही हुई। यह आपदा जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ती भारी वर्षा का परिणाम है, जिसने मुरैनी और भूस्खलन से उत्पन्न मलबे के साथ पानी को लेकर तेज बाढ़ का रूप दिया। खेरा गाड में आए मलबे के कारण न केवल भूस्खलन हुआ बल्कि कई स्थानों पर छोटे पैमाने पर लैंडस्लाइड डेम आउटबर्स्ट फ्लड (एलएलओएफ) भी उत्पन्न हुए।

समिति के अनुसार, उच्च ऊंचाई वाले क्षेत्रों में 4000 मीटर से ऊपर वर्षा के कारण मिट्टी की ताकत में कमी आई। जिससे भूस्खलन और मलबे का बहाव शुरू हो गया। पानी के दबाव से भी पहाड़ियों की संरचना में असंतुलन पैदा हुआ। इससे कई जगहों पर भूस्खलन और मलबे के प्रवाह में इजाफा हुआ।

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लिडार सर्वे से पता चला, कितना बढ़ गया था मलबा

समिति ने एसडीआरएफ, एनआईएम, सेना की तिरंगा टीम के सहयोग से ऊंचाई वाले स्थानों का निरीक्षण किया। धराली क्षेत्र में लिडार से किए गए सर्वे में यह पाया गया कि अब फैन का क्षेत्रफल 0.151 वर्ग किलोमीटर हो गया है। पहले यह क्षेत्रफल 0.74 वर्ग किलोमीटर था। इस मलबे में 2,50,885 टन मलबा डंप हुआ था।

5000 मीटर से नीचे 2570 मीटर आया मलबा

अध्ययन में ये पाया गया कि खेरा गाड के ऊपर 5000 मीटर की ऊंचाई पर भू-स्खलन सक्रिय था। मौसम विभाग के मुताबिक तो हर्षिल क्षेत्र में पांच अगस्त को आठ मिमी और पूरे उत्तरकाशी में 27 मिमी बारिश रिकॉर्ड हुईए लेकिन धराली आपदा के बाद भागीरथी नदी में आया उफान पानी की कहानी बयां कर रहा है। ये भी पाया गया कि यह तबाही 5000 मीटर की ऊंचाई सी नीचे धराली में 2570 मीटर तक पूरे वेग से आई। ताजे मलबे और खड़ी ढलानों के कारण मलबे के प्रवाह में इजाफा हुआ।

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124 साल की बारिश का आंकड़ा, 0.57 मिमी प्रतिवर्ष बढ़ रही बारिश

वैज्ञानिकों ने 124 साल में हुई बारिश की भी पड़ताल की। 1901 से 2024 के बीच इस क्षेत्र में मानसून सीजन में होने वाली बारिश में 0.57 मिमी प्रति वर्ष की दर से बढ़ोतरी हो रही है। न केवल मानसून बल्कि प्री मानसून में भी यहां बारिश तेजी से बढ़ रही है। समिति के अनुसार, मलबे की बाढ़ पूरी तरह से जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ी हुई वर्षा का परिणाम है। क्लाइमेट-इंड्यूस्ड मलबे फ्लो (सीआईडीएफ) की घटनाएं आने वाले वर्षों में और बढ़ सकती हैं, जिससे उच्च-ऊंचाई वाले क्षेत्रों में भूस्खलन और मलबे के प्रवाह में इजाफा हो सकता है। हर्षिल क्षेत्र में भी ऐसे खतरों का अनुमान है क्योंकि यह भी पहाड़ी ढलानों पर स्थित है।

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