लिडार सर्वे से पता चला, कितना बढ़ गया था मलबा
समिति ने एसडीआरएफ, एनआईएम, सेना की तिरंगा टीम के सहयोग से ऊंचाई वाले स्थानों का निरीक्षण किया। धराली क्षेत्र में लिडार से किए गए सर्वे में यह पाया गया कि अब फैन का क्षेत्रफल 0.151 वर्ग किलोमीटर हो गया है। पहले यह क्षेत्रफल 0.74 वर्ग किलोमीटर था। इस मलबे में 2,50,885 टन मलबा डंप हुआ था।
5000 मीटर से नीचे 2570 मीटर आया मलबा
अध्ययन में ये पाया गया कि खेरा गाड के ऊपर 5000 मीटर की ऊंचाई पर भू-स्खलन सक्रिय था। मौसम विभाग के मुताबिक तो हर्षिल क्षेत्र में पांच अगस्त को आठ मिमी और पूरे उत्तरकाशी में 27 मिमी बारिश रिकॉर्ड हुईए लेकिन धराली आपदा के बाद भागीरथी नदी में आया उफान पानी की कहानी बयां कर रहा है। ये भी पाया गया कि यह तबाही 5000 मीटर की ऊंचाई सी नीचे धराली में 2570 मीटर तक पूरे वेग से आई। ताजे मलबे और खड़ी ढलानों के कारण मलबे के प्रवाह में इजाफा हुआ।
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124 साल की बारिश का आंकड़ा, 0.57 मिमी प्रतिवर्ष बढ़ रही बारिश
वैज्ञानिकों ने 124 साल में हुई बारिश की भी पड़ताल की। 1901 से 2024 के बीच इस क्षेत्र में मानसून सीजन में होने वाली बारिश में 0.57 मिमी प्रति वर्ष की दर से बढ़ोतरी हो रही है। न केवल मानसून बल्कि प्री मानसून में भी यहां बारिश तेजी से बढ़ रही है। समिति के अनुसार, मलबे की बाढ़ पूरी तरह से जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ी हुई वर्षा का परिणाम है। क्लाइमेट-इंड्यूस्ड मलबे फ्लो (सीआईडीएफ) की घटनाएं आने वाले वर्षों में और बढ़ सकती हैं, जिससे उच्च-ऊंचाई वाले क्षेत्रों में भूस्खलन और मलबे के प्रवाह में इजाफा हो सकता है। हर्षिल क्षेत्र में भी ऐसे खतरों का अनुमान है क्योंकि यह भी पहाड़ी ढलानों पर स्थित है।