रुद्रप्रयाग के गांवों में बीते वर्षों तक बारह महीने पानी से लबालब रहने वाले पौराणिक नौले, धारे व जलकुंड बढ़ती गर्मी और बारिश कम होने के कारण सूखने लगे हैं। जबकि राजमार्गों व संपर्क मार्गों पर भी पड़ने वाले कई स्रोत सूख चुके हैं।
बीते वर्ष बरसात के बाद अभी तक सामान्य से 87 फीसदी कम बारिश हुई है, उससे भूजल का स्तर काफी कम हो गया है, जिसका असर प्राकृतिक नौले, धारों व जलकुंडों पर पड़ा है। ग्राम पंचायत नवासू में गडोणी व सुरजीग पौराणिक जलस्रोत सूखने के कगार पर पहुंच चुके हैं। वहीं, पणाधारा, कलेथ, बाड़ा और सिल्ला गांव के पौराणिक स्रोतों में पानी नामात्र रह गया है। रुद्रप्रयाग के गुलाबराय सहित तल्लानागपुर के भट्टगांव में पौराणिक धारा सहित घोलतीर, मवाणा, भटवाड़ी का प्राकृतिक जलस्रोत मौसम की बेरुखी से सूखते जा रहे हैं। पर्यावरण प्रेमी शिक्षक सत्येंद्र सिंह भंडारी का कहना है कि मौसम की बेरुखी के कारण भी और गांवों से नगरीय क्षेत्रों में पौराणिक जलस्रोतों के संरक्षण व सौंदर्यीकरण में सिमेंट व टाइल्स का प्रयोग हो रहा है। इस तकनीक से जहां भूमिगत जल के स्राव पर असर पड़ रहा है। वहीं बारिश का पानी जमीन में नहीं पहुंच रहा है, जिससे भूजल का स्तर तेजी से घट रहा है।
आमजन को जल संसाधनों की महत्ता व अपनी जरूरत को ध्यान में रखते हुए दीर्घकाल के लिए इनका पारंपरिक तरीके से संरक्षण व संवर्धन करना होगा। पौराणिक जलस्रोतों के आसपास पौधारोपण कर उसकी देखरेख कर जंगल विकसित करने होंगे, जिससे पानी संरक्षित हो सके।
- सच्चिदानंद भारती, प्रणेता पाणी राखो आंदोलन, उत्तराखंड।