राज्य आंदोलन की आंच में तपी गैरसैंण में यह आंदोलन का सवाल फिर उठेगा। यह सवाल है पहाड़ का विकास पहाड़ के नजरिए से। यही सवाल रहा है जिसका सामना सरकार ने मसूरी मेें हिमालयन कान्क्लेव के दौरान किया था। उस समय का मसूरी डिक्लेयरेशन इसका गवाह भी है।
इसी सवाल को प्रदेश सरकार और अन्य हिमालयी राज्य केंद्र सरकार के सामने उठा रहे हैं। गैरसैंण यही सवाल प्रदेश सरकार के सामने उठा रहा है। भराड़ीसैंण में शुक्रवार को हुई बर्फबारी के बाद जिस तरह से लोगों को परेशानी हुई उससे जाहिर है कि ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित होेने के बाद बार-बार भराड़ीसैंण आने वाली सरकार अपने इस सपने को धरातल में उतारने में देर हुई तो भराड़ीसैंण पनिशमेंट पोस्टिंग का पर्याय बन सकता है।
भावना में सबसे आगे, बुनियादी ढांचे में पीछे
राजधानी चयन आयोग की रिपोर्ट में भी गैरसैंण को जनभावना में सबसे आगे रखा गया था। आठ साल बाद आई रिपोर्ट में गैरसैंण के लिए बुनियादी ढांचे के विकास को सबसे बड़ी चुनौती बताया गया था। आयोग ने इसके लिए दिल्ली स्कूल और आर्किटेक्चर से अध्ययन कराया था। जनभावना के दबाव को देखते हुए रिपोर्ट में राजधानी के लिए किसी स्थान की स्पष्ट संस्तुति भी नहीं की गई लेकिन सरकार को सुझाव दिया गया था कि सरकार पैसों का प्रबंध करने के बाद ही राजधानी बनाएं।
भराड़ीसैंण में सुविधाओं की भारी कमी
गैरसैंण तो दूर भराड़ीसैंण में ही सत्र के दौरान कई कमियां सामने आईं। पहली चुनौती नेटवर्क की है। इस चुनौती का सामना करने के लिए सरकार को किसी भारी निवेश की जरूरत भी नहीं है। सरकार ने विधानभवन के लिए वाईफाई की व्यवस्था तो की लेकिन क्षेत्र के नेटवर्क की समस्या की ओर ध्यान नहीं दिया। यही हाल सड़क का भी है। कर्णप्रयाग से मात्र 55 किलोमीटर की दूरी तय करने में दो घंटे का समय लग रहा है।