उत्तराखंड आंदोलन के इतिहास और शहीदों की शहादत को सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले नौनिहालों को नहीं पढ़ाया गया तो वह दिन दूर नहीं, जब अगली पीढ़ी इस ऐतिहासिक घटना को पूरी तरह से भुला देगी। उन्हें यह भी याद नहीं रहेगा कि कितनी कठिनाईयों और शहीदों की शहादत के बाद यह राज्य बना।
विकास, पर्यावरण एवं सांस्कृतिक मुद्दों को लेकर युवा पीढ़ी संवेदनशील रहे इसके लिए इसे पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना जरूरी है। यह कहना है प्रदेश के वरिष्ठ लेखकों एवं साहित्यकारों का। उन्होंने कहा कि इससे हैरान करने वाली बात और क्या होगी कि भावी पीढ़ी को राज्य गठन की तिथि तक ठीक से याद नहीं है।
उत्तराखंड अलग राज्य की मांग ‘पांच प’, पानी, पलायन, पर्यावरण, पर्यटन और पहचान को लेकर की गई। लेकिन राज्य बनने के 15 साल बाद भी इसके लिए संघर्ष जारी है। यदि नई पीढ़ी ने राज्य आंदोलन को भुला दिया तो इसके लिए संघर्ष कौन करेगा। हैरानी की बात है कि जिन लोगों को यह काम करना चाहिए था उनके पास आंदोलनकारियों की सूची तक नहीं है।
- अतुल शर्मा, जनकवि
राज्य आंदोलन में सभी वर्गों की अहम भूमिका रही। आंदोलनकारियों ने लाठियां और सीने पर गोलियां खाईं। इस ऐतिहासिक घटना को जीवित रखने के लिए इसे पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए। आंदोलन के अलावा यहां की विभूतियों को भी पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए।
- डॉ. राम विनय सिंह, शिक्षक एवं वरिष्ठ साहित्यकार
बच्चों को जब यह जानकारी रहेगी कि कितनी कठिनाईयों के बाद यह राज्य मिला, तभी वह विकास, पर्यावरण और सांस्कृतिक मुद्दों को लेकर संवेदनशील रहेंगे और राज्य के प्रति अपनी जिम्मेदारी महसूस करेंगे। इसके लिए यह भी आवश्यक है कि बच्चों को इसका प्रमाणिक इतिहास ही पढ़ाया जाए।
- नंद किशोर हटवाल, वरिष्ठ साहित्यकार