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उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी ओमप्रकाश का 94 साल की उम्र में निधन, देहदान कर हुए अमर

Tue, 31 Dec 2019 08:40 AM IST
अलका त्यागी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून

सार

  • सोमवार दोपहर कैलाश अस्पताल में हुआ निधन 
  • परिजनों ने सिर के बाल लेकर किया अंतिम संस्कार
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उत्तराखंड आंदोलनकारी - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन में अहम भूमिका निभाने वाले चौधरी ओमप्रकाश वालिया देहदान कर अमर हो गए। 94 वर्षीय चौधरी ओमप्रकाश वालिया ने सोमवार दोपहर करीब सवा बारह बजे कैलाश अस्पताल में अंतिम सांस ली। उनके निधन पर विभिन्न आंदोलनकारी और सामाजिक संगठनों ने शोक जताते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दी। 

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बद्रीपुर रोड, जोगीवाला में रहने वाले चौधरी ओमप्रकाश के बेटे राजेश वालिया ने बताया कि गत मंगलवार को उनकी तबीयत खराब हुई थी। जिस पर उन्हें शास्त्रीनगर-जोगीवाला स्थित कैलाश अस्पताल में भर्ती कराया गया था। जहां चिकित्सीय जांच में पता लगा कि उनकी किडनी व लीवर फेल होने लगे हैं।

 

सोमवार को उपचार के दौरान उनका निधन हो गया। ओमप्रकाश अपने पीछे बेटे प्रदीप, राजेश, सुनील और बेटी रेनू तलवार का भरा पूरा परिवार छोड़ गए हैं। उनकी पत्नी इंदिरावती का वर्ष 2003 में निधन हो चुका है। जबकि एक और बेटे की भी कई साल पहले मृत्यु हुई थी। 
 

एनडी तिवारी सरकार में राज्य विकलांग बोर्ड (समाज कल्याण) के अध्यक्ष रह चुके राजेश वालिया ने बताया कि उनके पिता ने वर्ष 2010 में हिमालयन मेडिकल कॉलेज अस्पताल जौलीग्रांट में देहदान के लिए पंजीकरण कराया था। उनका निधन होने पर हिमालयन मेडिकल कॉलेज को सूचना दी गई। जिस पर कॉलेज के अधिकारी उनकी देह को जरूरी कार्रवाई के बाद ले गए। जहां अब मेडिकल के छात्र उनकी देह पर अध्ययन करेंगे।

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सिर के बाल लेकर किया परिजनों ने दाह संस्कार 

राजेश ने बताया कि पिता ने कहा था कि जब उनका निधन हो तो दाह संस्कार कर राख को उनके पैतृक गांव ले जाना। इस पर उनके सिर से बाल काटकर उनकी देह को मेडिकल कॉलेज अस्पताल को सौंपा गया। जिसमें बाद बालों का लक्खीबाग श्मशान में दाह संस्कार किया गया। उनकी राख को पैतृक गांव में विसर्जित किया जाएगा। ओमप्रकाश कम्यूनिस्ट पार्टी से जुड़े थे और किसानों व मजदूरों के नेता कहलाते थे। उनके निधन पर कम्यूनिस्ट पार्टी के नेता भी उनके घर पहुंचे।

मूलरूप में बामनौली के थे ओमप्रकाश 
ओमप्रकाश मूलरूप में गांव बामनौली, बागपत के रहने वाले थे। करीब 60-70 साल पहले दून में आकर बस गए थे। उत्तराखंड आंदोलन में उन्होंने और उनके परिवार ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। तीन अक्टूबर 1994 में आंदोलन करते हुए उनके छोटे पुत्र दीपक वालिया पुलिस की फायरिंग में शहीद हो गए थे। वे खुद भी कई बार आंदोलन की अगुवाई करते हुए जेल गए।
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