राजेश ने बताया कि पिता ने कहा था कि जब उनका निधन हो तो दाह संस्कार कर राख को उनके पैतृक गांव ले जाना। इस पर उनके सिर से बाल काटकर उनकी देह को मेडिकल कॉलेज अस्पताल को सौंपा गया। जिसमें बाद बालों का लक्खीबाग श्मशान में दाह संस्कार किया गया। उनकी राख को पैतृक गांव में विसर्जित किया जाएगा। ओमप्रकाश कम्यूनिस्ट पार्टी से जुड़े थे और किसानों व मजदूरों के नेता कहलाते थे। उनके निधन पर कम्यूनिस्ट पार्टी के नेता भी उनके घर पहुंचे।
मूलरूप में बामनौली के थे ओमप्रकाश
ओमप्रकाश मूलरूप में गांव बामनौली, बागपत के रहने वाले थे। करीब 60-70 साल पहले दून में आकर बस गए थे। उत्तराखंड आंदोलन में उन्होंने और उनके परिवार ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। तीन अक्टूबर 1994 में आंदोलन करते हुए उनके छोटे पुत्र दीपक वालिया पुलिस की फायरिंग में शहीद हो गए थे। वे खुद भी कई बार आंदोलन की अगुवाई करते हुए जेल गए।