पुलिस मान रही थी कि प्रधानमंत्री की रैली से एक दिन पहले पूरे शहर में सुरक्षा का कड़ा पहरा था, ऐसे में लूटपाट की बात बेमानी लग रही थी। पुलिस ने जांच पड़ताल शुरू की तो अनुरोध पंवार के बयान सत्यापित होते चले गए।
हालांकि, पुलिस को शक था कि बदमाशों ने पुलिस की वर्दी पहनकर इस घटना को अंजाम दिया है। इसमें दूर तक पुलिसकर्मियों के शामिल होने का अंदेशा नहीं था। सरकारी कैमरों की फुटेज से तो लूट में प्रयुक्त स्कारर्पियो को लेकर भी स्थिति साफ नहीं हो पाई थी।
प्रापर्टी डीलर अनुरोध पंवार ने पुलिस को बताया था कि पुलिसकर्मियों ने उन्हें सर्वे चौक पर छोड़ दिया था। पुलिस ने चार अप्रैल की रात ड्यूटी पर मौजूद पुलिसकर्मियों से पूछताछ शुरू की।
इसी बीच स्थैतिक निगरानी टीम में शामिल होमगार्ड ने खुलासा किया कि उस रात कार में सवार एक सिपाही ने उसके मोबाइल से किसी को फोन किया था। इस इसी कॉल ने पुलिस को आरोपियों तक पहुंचा दिया। दरअसल प्रापर्टी डीलर को रोकने के बाद आईजी गढ़वाल की गाड़ी में सवार पुलिसकर्मियों ने उन्हें अपने साथ बैठा लिया था।
प्रापर्टी डीलर की कार सिपाही मनोज अधिकारी पीछे-पीछे लेकर चल रहा था। इसी बीच जाम लगने के कारण कार चला रहा मनोज अधिकारी काफी पीछे छूट गया था। जबकि, वह अपना मोबाइल आईजी गढ़वाल की गाड़ी में ही भूल आया था। ऐसे में उसने रास्ते में एक होमगार्ड से मोबाइल लेकर आगे आईजी की गाड़ी चला रहे सिपाही हिमांशु उपाध्याय को फोन किया था। होमगार्ड से मिली जानकारी के बाद पुलिस हिमांशु तक पहुंची और फिर अन्य आरोपियों तक।