बैठक के दौरान मौजूद सीएम व संत
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पंचायती राज व्यवस्था के तहत जिला स्तर पर विकास योजनाओं को अमली जामा पहनाने वाली जिला नियोजन समितियां भी पंचायतों में सियासत का सामना करने को विवश हैं। समितियों के अध्यक्ष प्रभारी मंत्री हैं और विधायक इसमें आमंत्रित सदस्य हैं। ऐसे में कई बार विधायकों और प्रभारी मंत्री की गुटबाजी का सामना भी समितियों को करना पड़ता है। वहीं यह भी सामने आया है कि समितियों के सदस्य जिला पंचायत प्रतिनिधि अपने क्षेत्रों को तवज्जो देते हैं, जबकि जिले में कई क्षेत्र अछूते रह जाते हैं।
प्रदेश सरकार ने जिला नियोजन समितियों के लिए नियमावली 2010 में जारी की थी। नियमावली के तहत समितियों को पूरे जिले की विकास योजनाओं का खाका पेश करना होता है। इसमें अध्यक्ष प्रभारी मंत्री बना दिए गए और विधायकों को आमंत्रित सदस्य के रूप में समितियों में शामिल किया गया। ऐसे में विधायकों का दबदबा समितियों में बढ़ गया और प्रभारी मंत्री की शह मिलने पर जिला नियोजन समितियों के प्रस्तावों में विधायकों के प्रस्तावों को ही खासी जगह मिलने लगी। कई बार जिला पंचायत अध्यक्षों तक को इसमें हस्तक्षेप करना पड़ा। पंचायत प्रतिनिधियों के मुताबिक समिति के जिलाधिकारी सचिव होते हैं और ऐसे में पंचायत प्रतिनिधियों को कई बार मायूस होना पड़ता है। पंचायतों में सियासत हावी होने से यह समस्या अब बढ़ती जा रही है। समिति के स्थायी आमंत्रित सदस्यों में क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले संासद और नगर निकायों के प्रतिनिधि भी इस समिति में शामिल होते हैं।
नियोजन समितियों में क्षेत्र पंचायतें गायब
नियोजन समिति में ग्राम पंचायतों से लेकर जिला पंचायत तक के प्रतिनिधि शामिल होते हैं, लेकिन क्षेत्र पंचायत सदस्य इसमें बतौर प्रतिनिधि शामिल नहीं होते। पंचायत जनाधिकार मंच के संयोजक जोत सिंह बिष्ट के मुताबिक ग्राम पंचायतों के प्रतिनिधि अपनी पंचायत तक सीमित होते हैं और जिला पंचायत सदस्य अपने क्षेत्रों तक। ऐसे में क्षेत्र प्रमुख ही हैं, जो पूरे विकासखंड की एक पूरी तस्वीर को सामने रख सकते हैं। समिति में शामिल न होने के कारण अधिकतर ब्लॉक प्रमुख जिला नियोजन समितियों की बैठकों में शामिल ही नहीं होते।
राज्य निर्वाचन आयोग कराएगा समितियों का गठन
पंचायतों के चुनाव के बाद जिला नियोजन समितियों के गठन का दायित्व भी राज्य निर्वाचन आयोग की निभाएगा। पंचायत चुनाव की गहमागहमी के निपटते ही पंचायतों में यही चुनाव है जो बेहद गहमागहमी वाला बन जाता है।
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