फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

उत्तराखंड निकाय चुनाव 2018: पार हो गई हद, मतदाताओं के मताधिकार पर इस तरह पड़ा डाका

Sat, 24 Nov 2018 09:59 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
विज्ञापन
- फोटो : अमर उजाला फाइल फोटो
विज्ञापन

मतदाता एक और उसका पहचान पत्र भी एक। लेकिन उसके नाम की सूचियां तीन-तीन। उत्तराखंड में ये ही व्यवस्था है। इसके चलते मतदाताओं के मताधिकार पर हर बार डाका पड़ रहा है।

विज्ञापन


इस बार नगर निकाय चुनाव में तो हद ही पार हो गई। ऐसे में यह सवाल प्रासंगिक है कि राज्यभर में एक ही मतदाता सूची क्यों न हो ? भारत निर्वाचन आयोग भी इसके लिए पूर्व में दो बार राज्यों को निर्देश जारी कर चुका है।

मगर उत्तराखंड की सरकारी मशीनरी की इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है। अपने बचाव में उसके पास कई सारी तकनीकी और व्यवहारिक बातें हैं, जबकि हकीकत ये है कि अत्याधुनिक तकनीक के इस जमाने में थोड़ी सी दृढ़ इच्छा शक्ति ही मताधिकार पर डाके को कम कर सकती है।

विज्ञापन

उत्तराखंड में चार चुनाव के लिए तीन तरह की मतदाता सूची तैयार की जाती है। लोकसभा और विधानसभा चुनाव के लिए एक मतदाता सूची होती है, जिसे राज्य निर्वाचन कार्यालय तैयार कराता है।

पंचायत और स्थानीय निकाय चुनाव के लिए अलग-अलग मतदाता सूची होती है। इसे राज्य निर्वाचन आयोग तैयार करवाता है। नगर निकाय चुनाव में ये पहली बार नहीं हुआ कि बेहिसाब मतदाताओं के वोट कट गए। लोकसभा हो या विधानसभा चुनाव, ऐसे मामले सामने आते रहे हैं, जबकि एक चुनाव में मतदाता वोट डाल लेता है, लेकिन दूसरे चुनाव में वंचित रह जाता है। 
 

निर्वाचन विभाग से जुडे़ एक अफसर के अनुसार एक मतदाता सूची के लिए भारत निर्वाचन आयोग भी राज्यों से अपेक्षा कर चुका है। उत्तराखंड में दो बार शासन स्तर पर बैठकें भी हुई हैं। मगर कोई प्रगति नहीं हो पाई है। पूर्व राज्य निर्वाचन आयुक्त सुवर्धन के अनुसार एक मतदाता सूची के लिए बहुत पहले से बातचीत हो रही है, लेकिन कुछ तकनीकी दिक्कतों के चलते इस पर काम आगे नहीं बढ़ पा रहा है।

सैद्घांतिक तौर पर यह बात एकदम सही है कि उत्तराखंड में एक मतदाता सूची होनी चाहिए। इसके लिए समय-समय पर बात भी हुई है। लेकिन संबंधित पक्षों की तरफ से कुछ व्यावहारिक और तकनीकी अड़चन का जिक्र किया जाता है। कोशिश की जाएगी कि इस संबंध में कदम उठाए जा सकें।
- मदन कौशिक, मंत्री, निर्वाचन विभाग, उत्तराखंड

विभागों की अपनी-अपनी सुविधा का मामला

एक मतदाता सूची की राह में बड़ी अड़चन विभागों की अपनी-अपनी सुविधा भी है। दरअसल, उत्तराखंड में निर्वाचन का काम दो तरह से बंटा हुआ है। राज्य निर्वाचन कार्यालय और राज्य निर्वाचन आयोग ही सारे कार्यों को देखते हैं। लोकसभा और विधानसभा के चुनाव के दौरान भारत निर्वाचन आयोग के दिशा निर्देशों को अमली जामा पहनाने का दायित्व राज्य निर्वाचन कार्यालय के ऊपर होता है।

राज्य निर्वाचन आयोग का इससे कोई लेना देना नहीं होता। इसी तरह राज्य के पंचायत और निकाय चुनाव जब होते हैं, तो सब कुछ दायित्व राज्य निर्वाचन आयोग पर होता है। राज्य निर्वाचन कार्यालय की कोई भूमिका नहीं होती। यहां तक की दोनों ही चुनाव में अपनी-अपनी ईवीएम इस्तेमाल करते हैं। मतदाता सूची बनाने के मामले में दोनों पक्ष अक्सर जिम्मेदारी एक दूसरे के ऊपर डालते रहे हैं। इसकी वजह ये है कि निर्वाचन जहां अपने आप में अलग विभाग है, वहीं राज्य निर्वाचन आयोग का नोडल विभाग पंचायतीराज है।
विज्ञापन

वार्डों के तकनीकी पेच पर सबसे ज्यादा जोर

राज्य निर्वाचन आयोग पंचायत और निकाय की मतदाता सूची के संबंध में वार्डों की स्थिति पर सबसे ज्यादा जोर देता आया है। दरअसल, लोकसभा और विधानसभा चुनाव के लिए बनने वाली मतदाता सूची में वार्डों पर फोकस नहीं किया जाता है।

पूरे क्षेत्र के मतदाताओं को लिया जाता है, जबकि पंचायत और नगर निकाय के चुनाव में वार्डों की स्थिति के अनुरूप मतदाता सूची बनाई जाती है। वैसे जानकारों का मानना है कि थोडे़ से प्रयास करके एक ही मतदाता सूची में ये व्यवस्था संभव है कि सभी तरह के चुनाव में वह समान रूप से काम आ जाए।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें