जोशीमठ और आसपास के क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाने वाली ऋषिगंगा के कैचमेंट एरिया में सात दिन पहले तक कोई झील नहीं बनी थी। अंतरिक्ष उपयोग केंद्र को अपने शुरुआती डाटा रिव्यू के दौरान ऐसा कोई संकेत नहीं मिला है। ग्लेशियर की तलहटी में भूस्खलन, नदी का बहाव रुकने या बर्फ का पहाड़ गिरने को आपदा का कारण माना जा रहा है।
अंतरिक्ष उपयोग केंद्र हिमालय के हिमाच्छादित क्षेत्रों, ग्लेशियरों और नदियों पर सेटेलाइट के जरिये नियमित नजर रखता है। इसके अलावा उनकी लगातार मैपिंग भी की जाती है। ऋषिगंगा कैचमेंट में कुल 14 ग्लेशियर हैं। इनका पानी नंदा देवी पर्वत शृंखला के चारों ओर से निकलकर ऋषि गंगा में मिलता है। इसके अलावा ऋषिगंगा, यमुना, भागीरथी, अलकनंदा, धौलीगंगा, मंदाकिनी समेत दर्जनों नदियों की भी मॉनिटरिंग की जा रही है।
अंतरिक्ष उपयोग केंद्र के निदेशक प्रो. एमपीएस बिष्ट के अनुसार 30 जनवरी को सभी डाटा का रिव्यू किया गया था। तब झील बनने का कोई संकेत नहीं मिला था। आपदा के बाद केंद्र ने उस क्षेत्र के पिछले सात दिनों के डाटा का भी रिव्यू किया, जिसमें शुरुआती तौर पर झील बनने की पुष्टि नहीं हुई है।
घाटी में कई जगह बड़े-बड़े भूस्खलन केंद्र
प्रो. एमपीएस बिष्ट के अनुसार, प्रभावित घाटी में कई जगह भूस्खलन के बड़े केंद्र हैं, जिसके कारण कई बार पहाड़ी ढालों का खिसकना, चट्टानों का गिरना जैसी घटनाएं होती रहती हैं, जो नदी की राह में बाधा उत्पन करती हैं। अगर कुछ घंटे पहले भूस्खलन हुआ हो या बर्फ की कोई बड़ी चट्टान गिरी हो, जो अपने साथ मलबे को लाकर नदी के बहाव को रोक सकती है। जब यह पानी झटके से बाहर निकलेगा तो वहां की बड़ी ढलानों पर तेजी से नुकसान करता हुआ आगे बढ़ेगा। जब इन स्थानों पर अस्थायी झील बनती है तो पानी और मलबे के दबाव में वह कुछ घंटे में ही टूट जाती है।
हाई रेजोल्यूशन कैमरों से हो रही मैपिंग
देहरादून स्थित अंतरिक्ष उपयोग केंद्र हाई रेजोल्यूशन कैमरों और सेटेलाइट की मदद से पूरे हिमालयी क्षेत्र की मैपिंग कर रहा है। पहले 1/50000 स्केल पर लिस्ट थ्री का डाटा के आधार पर पहले निष्कर्ष निकाले जाते थे। अब लिस्ट फॉर के डाटा के आधार पर 1/10000 स्केल हाई रेजोल्यूशन डाटा मिल रहा है, जिससे बेहतर डाटा प्राप्त होते हैं।
हम नियमित तौर पर पूरे हिमालयी क्षेत्र की सेटेलाइट मैपिंग को रिव्यू करते हैं, जिससे कि कोई भी बदलाव दिखने पर तुरंत उसे देखा जा सके, लेकिन हमें वहां झील बनने का कोई संकेत नहीं मिला है। वैसे भी झील बनने में ज्यादा समय लगता है। इसके बजाय अगर भूस्खलन हो जाए या बर्फ का पहाड़ गिर जाए तो तुरंत आपदा की स्थिति बन जाती है।
- प्रो. एमपीएस बिष्ट, निदेशक अंतरिक्ष उपयोग केंद्र