उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पाया जाने वाला बहुपयोगी औषधि पौधा सतवा ग्रामीण बेरोजगारों के लिए रोजगार के नए रास्ते खोल सकता है। एचएनबी गढ़वाल केंद्रीय विवि का उच्च शिखरीय पादप कार्यर्की शोध संस्थान (हैप्रेक) सतवा को व्यवसायिक अंदाज मेें प्रस्तुत कर इसका संरक्षण कर कृषिकरण की मुहिम में जुट गया है। कृषिकरण के लिए अगले वर्ष से हैप्रेक संस्थान किसानों को सतवा का पौधा उपलब्ध कराएगा। हृदय, दमा रोग और बलवर्धक दवाइयां तैयार करने में सतवा रामबाण औषधि के रूप में उपयोगी माना जाता है।
उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊं हिमालय क्षेत्र में 2000 से 2200 मीटर की ऊंचाई पर पाए जाने वाला शाकीय रायजोमेटस पौधा है सतवा। वनस्पति जगत में सतवा को पेरिस पोलीफिला के नाम से जाना जाता है। यह लिलियेसी कुल का एक बहुत ही महत्वपूर्ण औषधीय पादप है। स्थानीय भाषा में इसे दुधिया बच या सतवा के नाम से जाना जाता है।
इसकी जड़े औषधि तैयार करने में बेहद उपयोगी है, जिसको खोद कर स्थानीय लोग औनेपौने दामों पर जड़ीबूटी का व्यापार करने वालों को बेच देते है। अंतरराष्ट्रीय बाजार खासकर चीन, कोरिया, बर्मा, थाईलैंड और नेपाल में सतवा की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए पिछले कुछ वर्षों में स्थानीय लोगों ने सतवा का अवैज्ञानिक तरीके से अत्यधिक दोहन किया, जिससे यह विलुप्ति के कगार पर पहुंच गया था।
सतवा की उपयोगिता को देखते हुए एचएनबी गढ़वाल केंद्रीय विवि का हैप्रेक संस्थान विगत दो साल से ऊखीमठ स्थित पोथिबासा पौधशाला में इसका संरक्षण कर रहा है। काफी प्रयास के बाद शोध केंद्र में सतवा के बीजों से दो हजार पौधे तैयार हो पाए हैं। हल्दी की भांति इसकी जड़े होती है, जिससे औषधि तैयार की जाती है।
विलुप्त हो चुके बहुपयोगी औषधि सतवा की दो हजार पौधे ऊखीमठ पोथिबासा पौधशाला में तैयार की गई है, जिन्हें अगले वर्ष जुलाई-अगस्त में संस्थान की ओर से किसानों को कृषिकरण के लिए निशुल्क उपलब्ध कराया जाएगा। सतवा की जड़ों की कीमत स्थानीय बाजार में 5 हजार से लेकर 7 हजार रुपये प्रति किलो है।
-डा. विजयकांत पुरोहित, प्रभारी वैज्ञानिक, विस्तार शोध एवं पोथिबासा, पौधशाला हैप्रेक
व्यवसायिक खेती करने से गांव में थमेगा पलायन
एचएनबी गढ़वाल केंद्रीय विवि के हाई एल्टीट्यूड प्लांट फिजियोलॉजी रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में सतवा की व्यवसायिक खेती करने से ग्रामीणों को स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध होंगे। सतवा के पौधों को जंगली जानवर भी नुकसान नहीं पहुंचाते हैं।
इसके लिए सिंचाई की जरूरत भी नहीं है। ठंडे ऊंचे इलाकों में सतवा की खेती आसानी से की जा सकती है। सतवा से बलवर्धक औषधि तैयार की जाती है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी बहुत अधिक डिमांड है। पौधा लगाने पर तीन साल के अंदर इसकी जड़े तैयार हो जाती है। जड़ों से ही हृदय, दमा रोग और शक्तिवर्धक दवाई तैयार की जाती है।