आम धारणा है कि मरने के बाद जब व्यक्ति की आंखें निकाल दी जाती हैं तो उसका चेहरा विकृत हो जाता है। यह भी कारण है कि लोग आंखें दान करने में कतराते हैं। जबकि उनके परिजन भी नहीं चाहते की उन्हें क्षत-विक्षत शव देखने को मिले।
एम्स आई बैंक की स्वास्थ्य निदेशक एवं एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. नीती गुप्ता बताती हैं कि पहले आंख दान करने वाले व्यक्ति की दोनों आई बॉल निकाल दी जाती थी। लेकिन इस विधि की खास बात यह है कि इसमें पूरी आंख न निकालकर सिर्फ कॉर्निया निकाला जाता है। आई बैंक स्टाफ कॉर्निया प्राप्त करने के बाद उसमें कृत्रिम शैल लगा देते हैं। इसके बाद डोनर की आंखें उसी रूप में दिखाई देती हैं, जैसे पहले थी।
विभिन्न क्षेत्रों की तरह मेडिकल की दुनिया में भी रोज नए बदलाव हो रहे हैं। लैमेलर केराटोप्लास्टी भी इनमें से एक है। देश में प्रतिवर्ष करीब दो लाख कॉर्निया की जरूरत है, लेकिन मात्र 60 हजार के करीब ही मिल पाती हैं। इस तरह देखें तो यह कुल जरूतर का मात्र एक चौथाई ही है। जबकि दूसरे दूसरे देशों में कॉर्निया डोनेशन का प्रतिशत भारत की तुलना में कहीं बेहतर है। लेकिन नई तकनीक आने के बाद हमें विश्वास है कि लोग स्वैच्छिक नेत्र दान के लिए आगे आएंगे।
- डॉ. संजीव मित्तल, प्रोफेसर एवं एचओडी नेत्र विभाग, एम्स ऋषिकेश
संस्थान के आई बैंक ने बहुत कम समय में बड़ी उपलब्धियां हासिल की हैं। हम यहां नवीनतम तकनीक का उपयोग कर रहे हैं। आई बैंक की मदद से अधिक से अधिक लोगों की जिंदगी में रोशनी आए, इसके लिए समाज में बड़े स्तर पर जागरुकता लाए जाने की जरूरत है। जब तक लोग स्वैच्छिक रूप से नेत्र दान के लिए आगे नहीं आएंगे, तब तक बड़े बदलाव की उम्मीद कम ही है।
- प्रो. रविकांत, निदेशक, एम्स ऋषिकेश