बता दें कि भारत समेत दुनिया के कई देशों में पाए जाने वाले पीपल को कई नामों से जाना जाता है। आम हिंदी भाषा में जहां इसे पीपल वृक्ष कहा जाता है। वहीं इसे बोधि ट्री, द ट्री ऑफ़ इंटेलिजेंस के नाम से भी जाना जाता है। संस्कृत भाषा में इसे पिप्पल, मराठी में पिंपल, नेपाली पंजाबी में पीपल, गुजराती भाषा में पीपरों, तमिल में अरशु, मलयालम में अराचू और पर्शियन भाषा में दरखते लरंजा के नाम से जाना जाता है।
चिकित्सकीय गुणों से भरपूर होता है पीपल वृक्ष
बता दें कि पीपल वृक्ष न सिर्फ वैज्ञानिक व धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है वरन पीपल वृक्ष औषधीय गुणों से भी भरपूर होता है। आयुर्वेदिक ग्रंथों में पीपल के गुणों का विस्तृत वर्णन मिलता है। पीपल की पत्तियों और छाल से घाव, सूजन और दर्द में आराम मिलता है।
पीपल खून को साफ करने के साथ ही सुजोक, कफ, डायबिटीज, लिकोरिया व सांस की बीमारियों में फायदेमंद होता है। इसके अलावा पीपल वृक्ष का उपयोग हकलाहट दूर करने, दमा रोग, शारीरिक कमजोरी, कब्ज, पेचिश, पीलिया , मधुमेह, मूत्ररोग, गले के रोग, बांझपन, चर्मरोग, फोड़ा फुंसी जैसे रोगों को दूर करने में इस्तेमाल किया जाता है।
समुद्र तल से 1000 मीटर से अधिक ऊंचाई पर पाया जाता है पीपल वृक्ष
वनस्पति विज्ञानियों की मानें तो पीपल वृक्ष समुद्र तल से 1000 मीटर से अधिक की ऊंचाई पर पाया जाता है। जहां तक मंदसौर विज्ञानियों के मुताबिक देश के उप हिमालई क्षेत्रों के अलावा मध्य भारत के तमाम राज्यों में पीपल बहुतायत से पाया जाता है।
तेजी से बदलते दौर में पीपल की मांग कम है। पूरे साल पीपल के 200 पौधे ही बिक पाते हैं। जबकि पूर्व में पीपल के पेड़ों की मांग ज्यादा थी। पीपल को अब लोग सिर्फ पूजा पाठ के लिए ही खरीद कर ले जाते हैं।
- विश्वजीत ठाकुर, संचालक ठाकुर नर्सरी
संस्थान के वैज्ञानिकों की ओर से पीपल को लेकर फिलहाल कोई शोध नहीं किया जा रहा है। पीपल वृक्ष को लेकर शोध की जरूरत भी नहीं है। फाइकस प्रजाति के वृक्षों में शामिल पीपल हर जगह पाया जाता है। ऐसे में इसे लेकर शोध की कोई आवश्यकता भी नहीं है।
- अरुण सिंह रावत, निदेशक , वन अनुसंधान संस्थान