कागजों में करोड़ों का बजट है, लेकिन लगभग एक साल से राजकीय दून मेडिकल कॉलेज में एमआरआई मशीन नहीं लग पाई। अब दावा किया जा रहा है कि अगले तीन महीनों में एमआरआई मशीन लगाई जाएगी। विलंब का तर्क यह दिया जा रहा है कि चार करोड़ की कीमत वाली इस मशीन के लिए दो बार टेंडर जारी किए गए थे लेकिन किसी भी कंपनी से डील फाइनल नहीं हो पाई। अब तीसरी बार फिर टेंडर निकाले जा रहे हैं। जो भी कंपनी प्रस्ताव देगी, उसे मौका दिया जाएगा।
उत्तराखंड के अलावा उत्तर प्रदेश और हिमाचल के सीमावर्ती जिलों के मरीजों की समस्या को देखते हुए वर्ष 2007 में राजकीय दून अस्पताल में एमआरआई मशीन लगाई गई थी। इससे रोज 35 मरीजों की जांच की जाती थी। वर्ष 2017 में इस मशीन की अवधि पूरी हो गई।
उसके बाद भी इंजीनियरों से मेंटिनेंस कराकर वर्ष 2020 तक इससे जांच की गई। इस दौरान जांच के रिजल्ट में कमी आने के साथ-साथ बार-बार स्पाकिंग या आग लगने की घटनाओं के बाद लगभग एक साल पहले इसे बंद कर दिया गया था।
दोगुना शुल्क देकर मरीजों को करानी पड़ रही जांच
वर्तमान में मरीजों को निजी अस्पतालों और डायग्नोस्टिक केंद्रों में दो गुना शुल्क देकर एमआरआई जांच करानी पड़ रही है। एमआरआई के प्रभारी महेंद्र सिंह भंडारी ने बताया कि दून अस्पताल में रोजाना औसतन 35 एमआरआई जांच होती थी। यहां पर शुल्क भी शरीर के किसी भी एक हिस्से का 3500 रुपये तय है। निजी अस्पतालों में एक हिस्से की एमआरआई जांच का शुल्क कम से कम सात हजार रुपये है।
छह करोड़ रुपये हो चुके हैं स्वीकृत
एमआरआई जांच बंद होने के बाद से स्वास्थ्य महानिदेशालय, शासन, चिकित्सा शिक्षा विभाग और राजकीय दून मेडिकल कॉलेज अस्पताल के बीच नई मशीन मंगाने के लिए कागजी कार्यवाही चल रही है। कोविड की पिछली लहर के के दौरान ही इसके लिए शासन से छह करोड़ रुपये स्वीकृत हो चुके थे, लेकिन टेंडर में एक से ज्यादा कंपनी नहीं आईं। इससे मामला अधर में लटक गया है।
दो बार टेंडर डाले जा चुके हैं। अब तीसरी बार में जो भी कंपनी आएगी उसे टेंडर दे दिया जाएगा। एमआरआई मशीन मंगाकर इसे लगभग तीन महीने के भीतर इंस्टॉल कर दिया जाएगा। जिससे जरूरतमंद मरीजों को कम शुल्क पर जांच की सुविधा मिल पाएगी।
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डॉ. आशुतोष सयाना, प्राचार्य, दून अस्पताल