कुमाऊं में शास्त्रीय रागों पर आधारित बैठकी और कदमताल के साथ समूहबद्ध होकर होली गायन किया जाता है। शास्त्रीय रागों में काफी, जंगला काफी, विहाग, देश, जैजैवंती, परन, बागेश्वरी, श्याम कल्याण, परज, झिंझोटी, जोगिया, भैरवी, खम्माज, पीलू, बहार आदि रागों में होली गायन होता है।
खड़ी होली में समूहबद्ध होकर गायन करते हैं। इसमें दो पक्ष बनाए जाते हैं। एक पक्ष होली गायन शुरू करता है तो दूसरा पक्ष उन स्वरों को दोहराता है। होली गायन में हारमोनियम, तबला, ढोलक, ढोल, दमाऊं, मजीरा, हुड़का समेत तमाम स्थानीय वाद्य यंत्रों का प्रयोग किया जाता है।
स्वांग रचने की भी है प्राचीन परंपरा
होली गायन में किसी परिचित या स्वजन की नकल उतारने की परंपरा भी रही है, जिसे स्वांग रचना कहते हैं। किसी प्रसिद्ध व्यक्ति या समाज के व्यक्ति के रोचक प्रकरणों को शामिल कर स्वांग रचे जाते हैं। आज के दौर में स्वांग रचने की परंपरा में कुछ बदलाव देखने को मिलता है। सामाजिक बुराइयों जैसे दहेज, नशाखोरी, व्यभिचार के खात्मे और बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसे संदेश, राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने वाले संदेश आदि भी स्वांग में देखे जाते हैं।
-सिद्धि को दाता विघ्न विनाशन होली खेलें गिरिजा पति नंदन
- गोपिया ग्वाला लायो चीर, बांधो कन्हैया ध्वजा चीर
- तू भज ले भवानी शंकर को, भाल तिलक सिर गंग विराजे
- मत भूलो यशोदा नंदन को
- हरि धरैं मुकुट खेलें होरी
- हरि धरैं मुकुट खेलें होरी
- बलमा घर आए फागुन में
- बिरज में होरी कैसे खेलूंगी मैं सावंरिया के संग
- मत जाओ पिया होरी आई रही