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Uttarakhand News : अष्टवर्ग प्रजाति की जड़ी-बूटियां विलुप्त होने का खतरा, संरक्षण के लिए वैज्ञानिक कर रहे पहल 

Thu, 07 Jan 2021 03:54 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal अरविंद सिंह , अमर उजाला, देहरादून
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Social Media
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अष्टवर्ग प्रजातियों की आठ जड़ी-बूटियों रिद्धि, वृद्धि, जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा काकोली और छीरकाकोली के विलुप्त होने का खतरा खड़ा हो गया है। वनस्पति विज्ञानियों के अनुसार काकोली और छीरकाकोली जैसी जड़ी-बूटियां विलुप्त हो गई हैं। ऋषभक और जीवक जैसी जड़ी-बूटियों के विलुप्त होने का खतरा है। इन जड़ी-बूटियों के संरक्षण को लेकर वन अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक आगे आए हैं।

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बता दें, रिद्धि, बृद्धि, जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली और छीरकाकोली जैसी अष्टकवर्ग प्रजातियों की जड़ी-बूटियों का च्यवनप्राश बनाने में इस्तेमाल होता है। चरक संहिता में भी इन जड़ी-बूटियों का उल्लेख है। अत्यधिक दोहन और संरक्षण न किए जाने के चलते ये जड़ी-बूटियां तेजी से विलुप्त हो रही हैं।

वन अनुसंधान शाखा के निदेशक व मुख्य वन संरक्षक संजीव चतुर्वेदी के मुताबिक अष्टवर्ग प्रजातियों की जड़ी-बूटियों में शामिल काकोली और छीरकाकोली लगभग विलुप्त हो चुकी हैं। कई जड़ी-बूटियां विलुप्त होने की कगार पर हैं। जड़ी-बूटियों के संरक्षण को लेकर कोई ठोस कारगर योजना नहीं बनाए जाने से इनके विलुप्त हो जाने का खतरा मंडरा रहा है। 
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1500 से 3500 मीटर की ऊंचाई पर पाई जाती हैं जड़ी-बूटियां

काकोली, छीरकाकोली, रिद्धि, वृद्धि, मेदा, महामेदा, हिमालयी क्षेत्रों में 1500 से 3500 मीटर की ऊंचाई पर पाई जाती हैं। जहां तक उत्तराखंड का सवाल है तो उत्तराखंड के मुन्स्यारी, पिथौरागढ़, और तुंगनाथ जैसे क्षेत्रों में ये जड़ी-बूटियां पाई जाती हैं।

उत्तरकाशी में स्थापित किया जा रहा संरक्षण केंद्र

अष्टवर्ग प्रजातियों की जड़ी-बूटियों को संरक्षित किया जा सके इसके लिए जापान इंटरनेशनल को-ऑपरेशन एजेंसी (जायका) के सहयोग से उत्तरकाशी में संरक्षण केंद्र स्थापित किया जा रहा है। संरक्षण केंद्र को लेकर पिछले साल जुलाई में आयोजित ‘जायका’ की बैठक में केंद्र स्थापित किए जाने को लेकर निर्णय लिया गया था।

रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में कारगर हैं जड़ी-बूटियां

विशेषज्ञों के अनुसार अष्टवर्ग प्रजातियों की जड़ी-बूटियों का च्यवनप्राश बनाने में इस्तेमाल होता है। जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में बेहद कारगर हैं। रिद्धि, वृद्धि, जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली, छीरकाकोली के अलावा बेल, गोखरू, मुनक्का, बड़ी हरड़, नीलकमल, लाल चंदन, बड़ी इलायची, पुष्कर्मूल, काकड़ासिंगी, वन मूंग, वन उड़द गनियार, गंभारी, जीवंती, भूमि आंवला, कालाअगर, जैसी जड़ी बूटियों वनस्पतियों का प्रयोग च्यवनप्राश बनाने में किया जाता है। इन जड़ी-बूटियों के अलावा गाय का घी, शहद, वंशलोचन, दालचीनी, तेजपत्ता नागकेसर का भी इस्तेमाल च्यवनप्राश में होता है।

उत्तराखंड समेत हिमालयी राज्यों में पाई जाने वाली अष्टकवर्ग प्रजातियों की जड़ी-बूटियां जो कभी बहुतायत में पाई जाती थी। अब वे विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गई हैं। ऐसे में उनके संरक्षण को लेकर कार्य योजना तैयार की गई है। ‘जायका’ के सहयोग से उत्तरकाशी में संरक्षण केंद्र स्थापित किया जा रहा है। इसमें अष्टकवर्ग प्रजातियों की जड़ी-बूटियों को संरक्षित किया जाएगा। जड़ी-बूटियों के अत्यधिक दोहन को रोकने को लेकर कारगर नीति बनानी होगी।
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- संजीव चतुर्वेदी, मुख्य वन संरक्षक एवं निदेशक, अनुसंधान शाखा

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