शोध के तहत वर्ष में चार मौसम में पानी के सैंपल की जांच की जा रही है। सर्दी, गर्मी, मानसून और पोस्ट मानसून में 15 स्थानों से सैंपल लिए गए हैं। साथ ही पानी की गहराई, हवा की गति, तलछट भार का भी मूल्यांकन किया जा रहा है।
झीलों में मीथेन और अन्य हानिकारक गैसों के उत्सर्जन से हिमालयीय क्षेत्र को भी नुकसान पहुंच रहा है। इससे तेजी से बर्फ पिघलना, एवलांच आदि की घटनाएं बढ़ रही हैं। डॉ. नयन शर्मा के अनुसार माइक्रो क्लाइमेट की वजह से उत्तराखंड में टिहरी झील से निकलने वाली मीथेन गैस का हिमालयीय क्षेत्र पर भी प्रभाव पड़ रहा है, लेकिन यह प्रभाव कितना है, इसका अध्ययन के बाद ही आकलन किया जा सकेगा।
झील में इसलिए बनती हैं हानिकारक गैसें
वैज्ञानिक डॉ. नयन शर्मा ने बताया कि वायुमंडल में मौजूद हवा में ऑक्सीजन होती है, लेकिन झील आदि में यह ऑक्सीजन पानी की सतह पर जमा सेडीमेंट तक नहीं पहुंच पाती। इसके कारण यहां बैक्टीरिया पनपने लगते हैं जो मीथेन के साथ ही कार्बन डाई ऑक्साइड और नाइट्रस ऑक्साइड जैसी हानिकारक गैसें उत्सर्जित करते हैं।
यह है समाधान
डॉ. नयन शर्मा ने बताया कि मीथेन उत्सर्जन को रोकने के लिए कई उपाय अमल में लाए जाते हैं। जैसे जम्मू कश्मीर की डल झील में पानी को अन्य जगह पर निकासी करने से इस समस्या को कम किया गया। इसके अलावा कुछ केमिकल का भी प्रयोग किया जाता है। झीलों की तलहटी में जमा सेडीमेंट को कम कर गैसों के उत्सर्जन को रोका जा सकता है।