नई धमनियों को विकसित करती है झिल्ली
डॉ. कुमार ने बताया कि आंत की झिल्ली को जब पैरों में लगाया जाता है तो वह नई धमनियों को विकसित कर पुन: रक्त संचार शुरू देती है। इस प्रक्रिया में चार से पांच दिन का वक्त लग जाता है। सामान्य ऑपरेशन पेट में बड़ा चीरा लगाकर झिल्ली को सीधे आंत से खींचकर पैरों में लगाया जाता था लेकिन लेप्रोस्कोपी से छोटा चीरा लगाकर झिल्ली को वहां से हटाकर पैरों में त्वचा के नीचे बनाई गई टनल में डाल दिया गया है। लेप्रोस्कोपी तकनीक से यह प्रक्रिया पहली बार की गई है। उम्मीद है कि इसका परिणाम भी बेहतर आएगा।
पहाड़ों में इसका सबसे अधिक खतरा
चिकित्सक के मुताबिक सर्जरी विभाग की ओपीडी में हर महीने करीब 20 मरीज बर्जर बीमारी से ग्रसित आते हैं। इनमें से 15 मरीज सिर्फ पर्वतीय इलाकों के होते हैं। वर्षों तक बीड़ी पीने के बाद उसमें मौजूद निकोटीन धमनियों में एकत्रित होकर उसमें सूजन पैदा करता है। मैदानी इलाकों में भी ऐसे मरीजों की संख्या बहुत होती है।