यह हैं आपत्ति के मुख्य कारण
- अगर लाइसेंस के लिए नियामक आयोग में आवेदन करने वाली कंपनी के आवेदन पर 90 दिन के भीतर निर्णय नहीं होता तो स्वत: लाइसेंस जारी माना जाएगा। कंपनियां आयोग के किसी कर्मचारी से फाइल लटकवाकर इस प्रावधान का लाभ ले सकती हैं।
- जो भी प्राइवेट कंपनियां आएंगी, वह सरकारी पूर्व से स्थापित इन्फ्रास्ट्रक्चर का इस्तेमाल करेंगी। उन्हें कुछ भी खर्च नहीं करना। खास बात यह है कि बिजली किसे देनी है और किसको नहीं, यह अधिकार भी कंपनियों को होगा। ऐसे में मुनाफे वाले उपभोक्ताओं जैसे इंडस्ट्री व कॉमर्शियल को कंपनियां बिजली देंगी और आम घाटे वाले उपभोक्ताओं को निगमों को ही बिजली देनी होगी। इससे निगम घाटे में जाते हुए बीएसएनएल जैसे हालात में पहुंच जाएंगे।
- बिल में यह प्रावधान है कि अगर कोई कंपनी कई राज्यों के लिए मल्टी लाइसेंस चाहती है तो सीधे केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग से लाइसेंस मिल जाएगा। राज्य को पता भी नहीं चलेगा कि उनकी बिजली वितरण किसके हाथ चली गई।
- बिजली कंपनी जब चाहेगी, तब आएगी और जब चाहेगी बोरिया बिस्तर बांधकर जा सकेगी। इसमें कंपनी के बाहर जाने के लिए कोई बैरियर नहीं लगाया गया है। ठेका लेने वाली कंपनी अगर चाहेगी तो स्थानीय स्तर पर किसी अन्य को अपनी फ्रेंचाइजी भी दे सकेगी।
- बिल में प्रावधान है कि फ्यूल एंड पावर परचेज सरचार्ज को कंपनियां साल में बढ़ा सकेंगी, जिसके लिए उन्हें नियामक आयोग के एप्रूवल की भी जरूरत नहीं होगी।
- बिजली कर्मचारी संगठनों को डर है कि जिस तरह निजी कंपनियों ने करीब एक लाख 45 हजार करोड़ रुपये का यूजर चार्ज अभी तक बीएसएनएल को नहीं लौटाया है, उसी तरह निजी कंपनियां सरकारी इन्फ्रास्ट्रक्चर के इस्तेमाल का यूजर चार्ज देंगी, इसकी कोई गारंटी नहीं है।
- बिजली कंपनियां अपने हिसाब से रेट वसूलेंगी। अभी तक अलग-अलग उपभोक्ता श्रेणी जैसे घरेलू, बीपीएल से अलग दर पर बिजली के दाम वसूले जाते हैं लेकिन निजी कंपनियों के लिए सभी समान होंगे। ऐसे में किसानों को भी बिजली में रियायतें दूर की बात होंगी।