अंतरराष्ट्रीय मुक्केबाज कैप्टन हरी सिंह थापा ने खेलों में ही नहीं बल्कि रणभूमि में भी पराक्रम दिखाया था। 1971 के भारत-पाक युद्ध में उन्होंने अद्भुत शौर्य का प्रदर्शन किया था। देश के प्रति समर्पण को देखते हुए सेना ने उन्हें विभिन्न सम्मान दिए। जिनमें रक्षा पदक, संग्राम पदक, सेना मेडल, इंडियन इंडिपेंडेंट पदक और नाइन ईयर लौंग सेवा पदक भी शामिल है।
रेफरी के गलत निर्णय से करना पड़ा था रजत पदक से संतोष
कैप्टन हरी सिंह थापा को 1958 में टोक्यो जापान में आयोजित तृतीय एशियाई खेलों में रेफरी के गलत निर्णय का शिकार होना पड़ा था। रेफरी के गलत निर्णय के कारण उन्हें स्वर्ण पदक के बजाय रजत पदक से संतोष करना पड़ा था। धरोहर पुस्तक के लेखक राजेश मोहन उप्रेती बताते हैं कि उस प्रतियोगिता के फाइनल में कैप्टन थापा का मुकाबला ताइवान के चाइंग लोपो के साथ हुआ। रेफरी ने अपने विवादास्पद निर्णय में ताइवान के खिलाड़ी को विजयी घोषित कर दिया। वह कहते हैं कि रेफरी के उस निर्णय की तब काफी आलोचनाएं हुई थीं। तत्कालीन भारतीय टीम मैनेजर सत्यनाथन के अनुसार थापा उस मुकाबले में हर तरह से स्वर्ण पदक के हकदार थे। तब समाचार पत्रों ने भी इस निर्णय की कड़ी आलोचना की थी।
कैप्टन थापा को कहा जाता है बॉक्सिंग का भीष्म पितामह
द्रोणाचार्य पुरस्कार सहित तमाम सम्मान पाने वाले कैप्टन हरी सिंह थापा को पिथौरागढ़ जिले में मुक्केबाजी खेल का जनक और भीष्म पितामह कहा जाता है। श्रेष्ठ मुक्केबाजी से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाम कमाने वाले कैप्टन थापा राष्ट्रीय कोच भी रहे। उनके मार्गदर्शन में प्रशिक्षण लेने वाले देश के कई बॉक्सर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फलक पर चमके। उनके शिष्यों में शामिल पदम बहादुर मल ने जकार्ता एशियन खेलों में स्वर्ण पदक के साथ ही सर्वश्रेष्ठ मुक्केबाज का पदक जीता था। हवा सिंह एशियन स्वर्ण पदक विजेता होने के साथ ही द्रोणाचार्य पुरस्कार से भी सम्मानित हुए। इसके अलावा ओम प्रकाश भारद्वाज, एमके राय, एसके राय, सात बार राष्ट्रीय चैंपियन रहे मूल सिंह, एमएल विश्वकर्मा, धर्मेंद्र प्रकाश भट्ट, भाष्कर भट्ट, राजेंद्र सिंह सहित तमाम ऐसे खिलाड़ी हैं जो कैप्टन थापा के प्रतिभाशाली शिष्यों में शामिल रहे हैं। पिथौरागढ़ के वर्तमान जिला क्रीड़ा अधिकारी संजीव कुमार पौरी भी उनके शिष्यों में शामिल रहे हैं। उनके निधन पर उनके तमाम शिष्यों ने गहरा दुख व्यक्त किया है।