पुल निरीक्षण की व्यवस्था नहीं
भारत में विदेश की तरह पुल निरीक्षण और सुरक्षा की व्यवस्था नहीं है। जापान में हर पांच साल में पुलों के निरीक्षण की व्यवस्था है। अमेरिका हर दो साल में निरीक्षण करता है, कनाडा में डेढ़ साल में और ब्रिटेन में हर दो साल में निरीक्षण अनिवार्य होता है। सभी इसके लिए व्यापक धन का प्रावधान करते हैं। इसके लिए सेंसर, एआई-आधारित निगरानी, ड्रोन और डिजिटल ट्विन सिमुलेशन जैसी उन्नत तकनीकों का उपयोग किया जाता है। भारत में डिजाइन के लिए इंडियन रोड कांग्रेस है, लेकिन सुरक्षा ऑडिट के लिए कुछ नहीं है। हालांकि राज्यों के सड़क व भवन विभागों को मानसून से पहले और बाद में पुलों का निरीक्षण करना अनिवार्य है लेकिन अधिकांश एनएचएआई के अंतर्गत आने से जवाबदेही की कमी है।
पुल ढहने की एक वजह खनन भी
अक्सर रेत का अवैध खनन करने वाले पुल के आसपास ही खनन करते हैं। इस वजह से पुल के खंभे असुरक्षित हो जाते हैं और नींव खुल जाती है। जिससे पानी के तेज बहाव से पुल ढह जाते हैं। विशेक्षत्रों के मुताबिक रेत एक छिद्रपूर्ण पदार्थ है जो पानी को अवशोषित करता है जिससे पानी के प्रवाह को कम करने में मदद मिलती है। जब नदी के तल से रेत हटा दी जाती है, तो नदी अधिक गति और अधिक मात्रा में बहती है। जिससे संरचना पर दबाव बढ़ता है और यह उन्हें गिराने में प्रमुख कारणों में से एक होता है।
अवैध खनन पर रोक लगाने की कोशिशें नाकाम
बड़े पैमाने पर रेत खनन के खिलाफ नैनीताल उच्च न्यायालय में दो दर्जन से ज्यादा जनहित याचिकाएं दायर की गई हैं। अदालत ने समस्या का संज्ञान लिया लेकिन ज़मीन पर बहुत कम बदलाव हुआ है। खनन माफिया के खिलाफ आवाज उठाने पर प्रमुख पर्यावरणविद् डॉ. भरत झुनझुनवाला का चेहरा काला कर दिया गया। जनहित याचिका देने वाले कई कार्यकर्ताओं धमकियां दी गई हैं।
पुलों की डिजाइन, सुरक्षा और मैटेरियल की गुणवत्ता पर ध्यान देना बहुत जरूरी है। इसके साथ ही आवश्यक है कि निर्माण में सक्षम लोग हों और सही तरीके से नियमित जांच हों। क्योंकि नदियों का बहाव बढ़ने पर मलबा भी आता है जिससे उसकी नींव पर असर न पड़े इसका ध्यान रखना जरूरी है। हमें पुल के साथ एप्रोच रोड पर भी ध्यान देना चाहिए। क्योंकि जब बहाव में बाधा आएगी तो नदी किनारे पर कटान करेगी जैसा दून में हुआ। इसके अलावा निर्माण से लेकर जांच तक की सबकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। - अजय चौरसिया, वरिष्ठ वैज्ञानिक, सीबीआरआई
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सरकारी अधिकारी इन आपदाओं के लिए भारी वर्षा और बादल फटने को जिम्मेदार ठहराते रहते हैं। सच तो यह है कि सड़क निर्माण के कारण नदियों में मलबा फेंका जा रहा है। जिससे मलबे की मात्रा और घनत्व में वृद्धि हुई है। अवैध रेत खनन से नदियों के बहाव की स्थिति और खराब हो जाती है। - डॉ. एसपी सती, प्रमुख भूविज्ञानी, एचएनबी गढ़वाल विश्वविद्यालय