एक अहम कारण यह भी है कि राज्य गठन से पहले से लेकर आज तक यह विधानसभा सीट विकास के मामले में पिछड़ी रही जबकि यहां पर विकास की काफी संभावनाएं हैं। सल्ट विधानसभा सीट से होकर ही रामनगर से गैरसैंण, कर्णप्रयाग के लिए सड़क है।
अगर यहां से स्वयं सीएम विधायक बनते हैं तो इस क्षेत्र का विकास के मामले में भी कुछ भला होने के आसार हैं। अब देखना यह है कि भापजा नेतृत्व सीएम को विधानसभा का सदस्य बनाने के लिए कहां से चुनाव लड़वाती है।
वहीं, आपको बता दें कि तीरथ रावत से पहले चार सांसद उत्तराखंड के सीएम बन चुके हैं। इनको विधानसभा सदस्य बनने के लिए बाद में उपचुनाव लड़ना पड़ा था। इस परंपरा की शुरुआत 2002 में तत्कालीन सीएम एनडी तिवारी ने की थी। वह नैनीताल से लोकसभा के सांसद थे। सीएम बनने के बाद उन्होंने रामनगर विधानसभा सीट से उपचुनाव जीता था। इसी तरह पौड़ी गढ़वाल से ही सांसद रह चुके भुवन चंद्र खंडूड़ी राज्य का सीएम बनने के बाद धूमाकोट से विधायक बने।
इसके बाद टिहरी से सांसद विजय बहुगुणा जब कांग्रेस की ओर से सीएम बने तो उन्होंने सितारगंज से विधानसभा का चुनाव जीता था। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत जब सीएम बने तब उन्होंने धारचूला से विधानसभा का चुनाव जीता था। उनके लिए पार्टी के ही विधायक हरीश धामी ने सीट छोड़ी थी।