जड़ी-बूटियों पर मंडराया संकट
तुंगनाथ में स्थित गढ़वाल विश्वविद्यालय का एल्पाइन रिसर्च सेंटर उच्च हिमालयी क्षेत्र में पाई जाने वाली दुर्लभ जड़ी-बूटियों के संरक्षण, संवर्धन और उत्पादन पर कार्य कर रहा है। यहां अतीस, कुटकी, जटामांसी, वन तुलसी सहित कई महत्वपूर्ण औषधीय वनस्पतियों पर शोध किया जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, बर्फ का अभाव इन पौधों के प्राकृतिक जीवन चक्र को प्रभावित कर रहा है। गढ़वाल विवि के प्रो. पदमश्री एनएन पुरोहित के निर्देशन में 1985 से तुंगनाथ स्थित विवि के एल्पाइन शोध केंद्र में कार्य शुरू हो गया था, तब से पहली बार यहां जनवरी में बर्फ विहीन स्थिति देखी जा रही है। गढ़वाल विश्वविद्यालय के भूगोलवेत्ता प्रो. मोहन पंवार बताते हैं कि हिमालयी क्षेत्र में मौसम का पारंपरिक चक्र तेजी से बदल रहा है। तुंगनाथ जैसे उच्च हिमालयी क्षेत्र में जनवरी में बर्फ का न होना असामान्य ही नहीं, बल्कि चिंताजनक संकेत हैं।
पांच वर्षों में केवल एक बार दिसंबर में हुई सामान्य बरसात
मौसम विज्ञान केंद्र देहरादून के निदेशक डॉ. सी.एस. तोमर ने बताया कि दिसंबर में बारिश कम होने की स्थिति के मामले भी पहले भी रहे हैं। वर्ष-2020 से 2025 तक दिसंबर के महीने में सामान्य या उससे अधिक बारिश केवल वर्ष-2024 में हुई थी। जनवरी की बात करें तो जनवरी-2020 और 2022 दो साल ही ऐसे रहे हैं, जब सामान्य या उससे अधिक बारिश हुई है। इस समय पश्चिम विक्षोभ जम्मू-कश्मीर क्षेत्र में सक्रिय है। जनवरी के दूसरे सप्ताह में बारिश और बर्फबारी होने की संभावना रहेगी। पहले भी देखा गया है कि जनवरी के दूसरे सप्ताह के बाद ही बारिश होने या तापमान में कमी आती है।
जंगल की आग की घटनाएं सामने आ रहीं
नवंबर-2025 के बाद से वन विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश में 31 वनाग्नि की घटना हो चुकी है। इसमें 15 हेक्टेयर क्षेत्रफल में जंगल को नुकसान हो चुका है। मुख्य वन संरक्षक सुशांत पटनायक कहते हैं कि जंगल की आग के दृष्टिगत मौसम एक महत्वपूर्ण पहलू है। वनों की आग के नियंत्रण के लिए हर संभव कदम उठाए गए हैं। विदित हो कि बारिश और बर्फबारी होने से जंगल में नमी रहती है। जंगल के शुष्क न होने से वनों में आग की घटनाएं कम होने की संभावना रहती है।
गढ़वाल विवि के उच्च शिखरीय पादप कार्यिकी शोध संस्थान के निदेशक एवं जड़ी-बूटी विशेषज्ञ डॉ. विजयकांत पुरोहित बताते हैं कि अल्पाइन क्षेत्र की अधिकांश औषधीय वनस्पतियां शीतकालीन बर्फ पर निर्भर रहती हैं। बर्फ न केवल तापमान को संतुलित रखती है, बल्कि नमी का स्थायी स्रोत भी होती है। यदि बर्फ नहीं गिरी तो जड़ी-बूटियों के अंकुरण, वृद्धि और औषधीय गुणों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। गढ़वाल विवि का तुंगनाथ में एल्पाइन शोध केंद्र है, बर्फबारी न होने से यहां शोध कार्य प्रभावित हो रहे हैं।
- डॉ. विजयकांत पुरोहित, निदेशक उच्च शिखरीय पादप कार्यिकी शोध संस्थान
प्रदेश में सूखे से फसलों को क्षति की 10 जिलों की रिपोर्ट मिल चुकी है। बारिश न होने से फसलों के पैदावार में भी कमी आई है। पत्तियां भी पीली होने लगी हैं। जल्द बारिश न हुई तो नुकसान बढ़ सकता है।
- दिनेश कुमार, कृषि निदेशक
सेब के लिए चिलिंग रिक्वायरमेंट (शीतलन आवश्यकता) 1000-1500 घंटों तक जरूरी है। बारिश और बर्फबारी न होने से सेब के साथ ही अन्य फसलों पर भी इसका असर पड़ेगा।
- डॉ अजीत सिंह नैन, वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक पंतनगर विश्वविद्यालय