प्रशिक्षण प्राप्त करने के तुरंत बाद ही शैलेंद्र ने घर में ही 15 गुणा 8 फुट के कमरे में एक टन कंपोस्ट पर मशरूम उत्पादन शुरू किया। वर्तमान में वह कंपोस्ट से भरे 75 बैगों में रोजाना आठ से दस किलो बटन मशरूम पैदा कर रहे हैं।
शैलेंद्र ने बताया कि दस किलो तक मशरूम को वह स्थानीय बाजार में ही बेच देते हैं। यदि इससे अधिक उत्पादन हुआ तो उसे हल्द्वानी स्थित मंडी में ले जाते हैं। जहां उन्हें 80-100 रुपये प्रति किलो तक का भाव आसानी से मिल जाता है। जबकि खुले बाजार में बटन मशरूम की बिक्री 200-225 रुपये किलो तक होती है। उन्होंने बताया कि इस कुटीर उद्योग को शुरू करने में केवल 17 हजार रुपये की लागत आई है।
शैलेंद्र ने बताया कि उद्यान विभाग 50 फीसदी अनुदान पर कंपोस्ट उपलब्ध कराता है साथ ही उसे प्रोजेक्ट स्थल तक लाने में भी 50 फीसदी का अनुदान देता है। वह बताते हैं कि एक टन कंपोस्ट पर वह कम से सम 150 से 175 किलो तक मशरूम उत्पादन कर लेंगे।
शैलेंद्र का कहना है कि मशरूम उत्पादन से बेरोजगारों को स्वरोजगार से जोड़ा जा सकता है, क्योंकि यह कम लागत और कम समय में लाभ देने वाला व्यवसाय है। वह कहते हैं कि बाजार में मशरूम की खूब मांग है।