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उत्तराखंड : रिटायर को रोजगार, 50 पार पर जबरन रिटायरमेंट की तलवार? कर्मचारी संगठनों का सवाल

Sun, 14 Jun 2020 01:00 AM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
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trivendra singh rawat - फोटो : File Photo
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प्रदेश सरकार के कार्मिक विभाग के हाल ही में जारी दो आदेश कर्मचारी संगठनों के बीच चर्चा का विषय बने हैं। पहला आदेश 50 वर्ष व उससे अधिक की आयु के अधिकारियों व कर्मचारियों को अनिवार्य सेवानिवृत्ति पर भेजने को लेकर है। दूसरा आदेश रिटायर्ड नौकरशाह एस रामास्वामी को सेवा का अधिकार आयोग का मुख्य आयुक्त बनाए जाने को लेकर है। इन दोनों आदेशों पर कर्मचारी नेताओं का सवाल है कि आखिर ऐसा क्यों है कि खर्चों में कटौती के दौर में रिटायर्ड नौकरशाहों को रोजगार दिया जा रहा है और 50 व उसके पार के कर्मचारियों पर जबरन रिटायरमेंट की तलवार लटकाई जा रही है। 

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अनिवार्य सेवानिवृत्ति को लेकर कार्मिक विभाग का आदेश पुराना है। उसने नए आदेश में दिशा-निर्देश और स्क्रीनिंग कमेटियों के स्वरूप को स्पष्ट किया है। लेकिन कर्मचारी संगठनों को स्क्रीनिंग कमेटियों के गठन को लेकर भी एतराज है। राज्य संयुक्त कर्मचारी परिषद का कहना है कि शासन ने स्क्रीनिंग कमेटियों में केवल विभागीय अफसरों को रखा है, कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व उसमें नदारद है। पारदर्शी प्रक्रिया के लिए यह आवश्यक है कि स्क्रीनिंग कमेटी में मान्यता प्राप्त कर्मचारी संगठनों के प्रतिनिधियों को शामिल होना चाहिए।

परिषद को इस बात पर भी आपत्ति है कि सेवानिवृत्त नौकरशाहों व अफसरों को सरकार दोबारा नौकरी पर रख रही है। जबकि अपने जीवन के बहुमूल्य वर्ष सेवा के रूप देने वाले कर्मचारी पर अनिवार्य सेवानिवृत्ति की तलवार लटकाई जा रही है। उत्तरांचल पर्वतीय कर्मचारी शिक्षक संगठन को भी सरकार के विरोधाभासी आदेशों पर एतराज है। संगठन का मानना है कि आर्थिक संकट को देखते हुए संवैधानिक संस्थाओं में यदि पद खाली हैं, तो उन्हें प्रतिकूल हालातों को देखते हुए नहीं भरना चाहिए। संगठन भी स्क्रीनिंग कमेटियों में कर्मचारी वर्ग को प्रतिनिधित्व देने की मांग कर रहा है। 
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अनिवार्य सेवानिवृत्ति की व्यवस्था कोई नई नहीं है, लेकिन हमारी पहले से ही यह मांग रही है कि स्क्रीनिंग कमेटियों में कर्मचारी संगठनों के प्रतिनिधियों को भी सदस्य बनाया जाए। इस संबंध में परिषद अपर मुख्य सचिव से एक बार मुद्दा उठा चुकी है। उन्होंने नियमों प्रावधान न होने का हवाला दिया था। लेकिन सरकार चाहे तो क्या नहीं कर सकती। सरकार को नियमों में बदलाव कर कर्मचारियों को प्रतिनिधित्व देना चाहिए। सेवानिवृत्त लोगों को दोबारा नियुक्ति देने का कोई औचित्य नहीं है। यह विरोधाभास कर्मचारियों की आंखों में खटक रहा है। -अरुण पांडेय, कार्यकारी प्रदेश महामंत्री, राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद

कोविड-19 महामारी के संकट में सरकार ने कर्मचारियों के वेतन से कटौती की। लेकिन, इस संकट में भी वह रिटायर्ड नौकरशाहों को रोजगार देने में पीछे नहीं है। एक तरफ 50 साल व उससे ऊपर के कर्मचारियों को अनिवार्य सेवानिवृत्ति देने का आदेश जारी हो रहा है, दूसरी ओर एक नौकरशाह को नियुक्ति दी जा रही है। हमारी मांग है कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति को लेकर बनाई गई स्क्रीनिंग कमेटियों में कर्मचारियों को भी प्रतिनिधित्व दे। इस बारे में समान विचारधारा वाले संगठनों के साथ मिलकर रणनीति बनाई जाएगी। - पंचम सिंह बिष्ट, प्रदेश महासचिव, उत्तरांचल पर्वतीय कर्मचारी शिक्षक संगठन

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