भले ही संसद में महिला आरक्षण का बिल दो दशक से लटका हो। महिलाओं ने इसे लेकर आवाज भी उठाई लेकिन इस मसले को लेकर राजनीतिक दल गंभीर नहीं हैं। घर-गृहस्थी संभालने वाली महिलाओं ने पुरुषवादी समाज को आयना दिखाते हुए वोटिंग के प्रति खूब उत्साह दिखाया। अगर महिलाएं इस तरह बढ़ चढ़कर वोट न करतीं तो मतदान प्रतिशत पिछले लोकसभा चुनाव से भी कम रह जाता। महिलाओं का कहना है कि भले ही राजनीतिक दलों की ओर से उनके मुद्दों की अनदेखी होती रही है लेकिन वे लोकतंत्र की खातिर अपनी जिम्मेदारी को बखूबी जानती हैं।
ये रहे महिलाओं के प्रमुख मुद्दे
महिलाओं का कहना है कि वे देश की जिम्मेदार नागरिक हैं। इसके चलते उन्होंने घर का काम करने से पहले मतदान में हिस्सा लिया। चंपावत की उषा उप्रेती, पूजा खाती, भगवती पांडेय, लोहाघाट स्टेशन बाजार हरितिमा मुरारी, रेणु गड़कोटी, चांदमारी बीना अधिकारी, बलाई की जानकी देवी, डॉ. अर्चना त्रिपाठी का कहना है कि महिलाओं से संबंधित स्वास्थ्य सेवाएं, महिला डिग्री कॉलेज, पाटी में राजकीय बालिका इंटर कॉलेज की स्थापना, महिला सुरक्षा आदि मुद्दे उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण हैं। चंपावत जिले में महिलाओं के लिए एक भी गायनाकोलोजिस्ट नहीं है। उम्मीद है कि अधिक मतदान से उनके मसले संसद में पहुंचेंगे और हालात सुधरेंगे।
सैकड़ों महिलाओं के नाम भी मतदाता सूची से गायब
महिलाओं ने खूब मतदान किया लेकिन मतदाता सूची में सैकड़ों महिलाओं के नाम भी गायब थे। लोहाघाट की पुष्पा उप्रेती, सुंई डुंगरी कलावती चौबे, पार्वती देवी, कुलेठी की लक्ष्मी जोशी आदि का कहना है कि वे वोट देने के लिए बूथ तक गईं लेकिन मतदाता सूची में नाम न देख निराशा हुईं। उनका कहना है कि महिला मुद्दों के लिए वे दबाव बनाती रहेंगी।