महाराजधिराज श्री ज्ञानचंद देव जी ने पूर्णिमा के दिन श्री चक्रगिरधर, जैराम और चंद्रेश्वर सिमल्टिया को संकल्प कर भूमि दी। कुमाऊं में 15 बीसी (300 नाली भूमि) बोरा की आली में से ज्युला और खुनी की पैताल की भूमि से लगा हुआ ईजर सभी करों से मुक्त कर दिया। राजा ज्ञान चंद के वंशजों द्वारा उपभोग करवाना होगा और चक्रधर गिरधर, जैराम और चंद्रेश्वर सिमल्टिया की संतति को भोग करना होगा। जमीन के अंदर की वस्तु को छोड़कर सभी करों, घोड़ों, कुत्तों, बाजा बजाने वाले आदि जो महर कर था उससे भी मुक्त कर दिया गया है।
ताम्रपत्र के ये लोग रहे गवाह
जगत सिंह लल्लाज्यू (जगत चंद), वीरेश्वर पुरोहित, लछीमीपति पांडे, प्रतापादित्य, हरीमल, भीम सिंह गुसाईं, मान सिंह, श्रीरिषीकेश, भावानंद जोशी, नरसिंहसाहू, कुमाऊं का नेगी, कृष्णदेव अधिकारी, माउई का गर्खा नेगी, कर्ण सिंह भंडारी और जगत सैज्याली। भवानंद जोशी ने बृहस्पतिवार 15 गते सावन शुक्ल पक्ष साके 1623 में लिखा और भौना सुनार ने इसे टंकण किया।