प्रदेश में भू-कानून की मांग को लेकर भले ही प्रदेशभर में आंदोलन का दौर चल रहा हो लेकिन इसका नेतृत्व राजधानी से ही हो रहा है। तमाम राजनीतिक दल और गैर राजनीतिक सामाजिक संगठन भू-कानून को लेकर मुखर हैं। राज्य आंदोलनकारी भी लगातार इस मुद्दे को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। इसके अलावा विभिन्न सामाजिक संगठनों के सामूहिक मंच ने भी प्रदेश में भू-कानून की आवश्यकता को लेकर राजधानी में बैठकें, विचार गोष्ठियां आयोजित की हैं।
कांग्रेस भी गाहे-बगाहे इसको लेकर आवाज उठाती रही है। जबकि उत्तराखंड क्रांति दल, परिवर्तन पार्टी, स्वराज पार्टी समेत कई अन्य छोटे राजनीतिक दल भी भूमि खरीद को सीमित करने की मांग कर रहे हैं।
हरिद्वार: इस मैदानी जिले में भी सुलगने लगी भू-कानून की आग
राज्य में सख्त भू-कानून बनाने की आग जनपद में भी सुलगने लगी है। पर्वतीय मूल के लोग धरना-प्रदर्शन शुरू करने के साथ ही सीएम से कानून बनाने की मांग कर रहे हैं। धर्मनगरी में पर्वतीय बंधु समाज समिति की ओर से हिमाचल की तर्ज पर उत्तराखंड में भू-कानून बनाने के लिए धरना-प्रदर्शन किया जा रहा है।
हाल ही में समिति के बैनर तले धरना प्रदर्शन किया और मंगलवार को तहसील प्रशासन के माध्यम से मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को पत्र भेजकर भू- कानून बनाने को लेकर बड़ा आंदोलन करने की चेतावनी भी दी गई है। उत्तराखंड क्रांति दल के जिलाध्यक्ष राजीव देशवाल का कहना है कि पार्टी का शुरू से ही क्लीयर स्टेंड है कि भू-कानून बनना चाहिए। भू-कानून को लेकर पिछले तीन महीने से लगातर पार्टी अभियान चलाए हुए है। इसको लेकर चुनाव में भी जनता के बीच जाएंगे। भाजपा विधायक आदेश चौहान का कहना है कि जनभावनाओं को देखते हुए पार्टी संगठन जो भी विचार करेगा। उसके अनुसार कार्य किया जाएगा।
ऊधमसिंह नगर : भू-कानून को लेकर जिले में फिलहाल चुप्पी
भू-कानून के सुधार को लेकर तराई में राजनीतिक और सामाजिक संगठनों में फिलहाल चुप्पी है। इस मुद्दे को लेकर सियासी दल खुलकर सामने नहीं आए हैं। सत्तारूढ़ भाजपा के साथ ही कांग्रेस के नेता इस मामले में शीर्ष नेतृत्व के निर्देश मिलने पर ही कोई राय या कार्यक्रम करने की बात कह रहे हैं। वहीं आम आदमी पार्टी, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी भी इस मुद्दे को लेकर नहीं उठा रहे हैं। क्षेत्रीय दल यूकेडी की ओर से इस दिशा में मजबूत पहल जिले में नजर नहीं आ रही है। कुल मिलाकर भू- कानूनों में सुधार को लेकर जिले में फिलहाल कोई आवाज नहीं उठी है। गौर करने वाली बात यह है कि जमीनों की खरीद-फरोख्त तेजी से बढ़ी है।
भू-कानून में सुधार की मांग को लेकर जिले में फिलहाल खुले तौर पर कोई अभियान सड़क पर नजर नहीं आ रहा है। हालांकि सोशल मीडिया और लोगों के बीच सशक्त भू-कानून को लेकर चर्चा जरूर होने लगी है। राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि भी भू-कानून में सुधार की बात कर रहे हैं, लेकिन इसके लिए प्रदर्शन या प्रयास जैसी बात इन दलों की ओर से नजर नहीं आ रही है। जनता जरूर इस बारे में कह रही है कि राजनीतिक दल इस मसले पर एकमत होकर प्रदेश हित में सोचें।
अगर राजनीतिक दलों ने इस मुद्दे पर ध्यान नहीं दिया तो आने वाले समय में लोग इसे जनांदोलन का रूप दे सकते हैं। भाजपा जिलाध्यक्ष शिव सिंह बिष्ट कहते हैं प्रदेश में पहले के समान भू-कानून लागू किया जाना चाहिए। कांग्रेस के प्रदेश महामंत्री और पूर्व विधायक ललित फर्स्वाण का भी मानना है कि भू-कानून में छेड़छाड़ से माफियाराज बढ़ा है, इस कानून को तत्काल बदला जाना चाहिए। आम आदमी पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष बसंत कुमार भी राज्य की बेहतरी के लिए भू-कानून को जरूरी बताते हैं।
अल्मोड़ा : उक्रांद मुखर, उपपा भी चाहती है भू-कानून में संशोधन
भू-कानून को लेकर अल्मोड़ा जिले में उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी और उत्तराखंड क्रांति दल जैसी क्षेत्रीय पार्टिया लंबे समय से आंदोलन कर रही हैं। शहर में फिलहाल इस मुद्दे पर स्थानीय लोगों ने कोई प्रदर्शन नहीं किया है। 2018 के कानून का भी शुरू से ही उपपा और उक्रांद ने विरोध किया है। कई बार इसे लेकर स्थानीय पार्टियां प्रदर्शन कर चुकी हैं।
उपपा के केंद्रीय अध्यक्ष पीसी तिवारी ने बताया कि 2018 में जो कानून लागू किए गए वह पूरी तरह गलत है। इसी कानून के बहाने प्रदेश के प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा किया जा रहा है। पर्वतीय क्षेत्रों में कानून बनाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि चुनाव के दौरान फिर से भू-कानून का मुद्दा उठा है। यह सिर्फ चुनावी जुमला नहीं होना चाहिए। पर्वतीय क्षेत्र में जमीन खरीदने पर बाहरी राज्यों के लोगों को छूट दिया जाना सरासर गलत है।
चंपावत : भू- कानून के बगैर नहीं रुकेगी लूट
निवेश के नाम पर अक्तूबर 2018 में उत्तराखंड में जमीन खरीद की अधिकतम सीमा खत्म कर दी गई। अब पौने तीन साल बाद चुनावी साल में ये मुद्दा गरमा रहा है। शहर के चौराहों पर जनता इस मुद्दे पर चर्चा कर रही है, लेकिन बात अभी प्रदर्शन तक नहीं पहुंची है। वहीं भाजपा को छोड़ अन्य सियासी दल उत्तराखंड के लिए भू-कानून के लिए आवाज उठा रहे हैं।
कांग्रेस के प्रदेश महामंत्री और पूर्व विधायक हेमेश खर्कवाल कहते हैं कि भाजपा सरकार निवेश के नाम पर पहाड़ी राज्य की जमीन की लूट की बाहरी लोगों को छूट दे रही है। उक्रांद के केंद्रीय सदस्य बसंत तड़ागी का कहना है कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व इस मुद्दे पर मुखर है। आप के नेता नारायण सिंह गैड़ा कहते हैं कि निवेश के नाम पर प्रदेश से बाहर के लोगों की दस्तक पर्वतीय संसाधनों के लिए खतरनाक है। वहीं भाजपा जिलाध्यक्ष दीपक पाठक का कहना है कि वे कानून की बारीकियों का अध्ययन करने के बाद ही कुछ कहेंगे।
पिथौरागढ़ : राज्य में मजबूत भू- कानून की जरूरत
जनपद में फिलहाल भू-कानून को लेकर कोई प्रदर्शन नहीं हुए हैं। हालांकि यहां के कुछ युवाओं ने सोशल मीडिया पर चल रही इस मुहिम का समर्थन जरूर किया। वहीं लोगों से हुई बातचीत में सभी ने एक सुर में कहा कि अभी जो कानून है अगर उसमें बदलाव नहीं हुआ तो आने वाले समय में राज्य के लोग ही यहां भूमिहीन हो जाएंगे। भू-कानून संशोधन की सख्त जरूरत है।
उक्रांद जिलाध्यक्ष चंद्रशेखर का कहना है कि बाहरी लोगों को एकमुश्त भूमि खरीदने की अनुमति नहीं होनी चाहिए। कांग्रेस के पूर्व प्रदेश सचिव मनोज ओझा भी मानते हैं कि भू-कानून में जन आकांक्षाओं के अनुरूप परिवर्तन किया जाना चाहिए। आम आदमी पाटी के सुशील खत्री ने इस मुद्दे को अपने चुनावी घोषणा पत्र में शामिल करने की बात भी कही है। सपा जिलाध्यक्ष रमेश बिष्ट का कहना है कि नया भू-कानून कठोर होना चाहिए।
प्रदेश में नया भू-कानून लागू किए जाने की मांग सोशल मीडिया में खूब छाई हुई है। लेकिन सियासी दलों ने इसे अब तक मुद्दा नहीं बनाया है। दो दिन पूर्व हल्द्वानी में वंदे मातरम ग्रुप ने भू-कानून आर्टिकल 371, मूल निवास और इनर लाइन परमिट सिस्टम की मांग को लेकर बुद्ध पार्क में धरना प्रदर्शन किया था। उक्रांद इस मुद्दे पर मुखर जरूर है लेकिन उसके नेता सिर्फ बयानों तक ही सीमित हैं।
चमोली: ‘हिमाचल प्रदेश की तर्ज पर हो भू-कानून ’
चमोली जिले में उत्तराखंड क्रांति दल खुलकर भू-कानून के विरोध में आ गई है। पिछले एक माह से दल की ओर से जगह-जगह धरना-प्रदर्शन किए जा रहे हैं। दल के दशोली ब्लॉक अध्यक्ष दिगंबर सिंह फरस्वाण ने कहा कि यदि शीघ्र नया भू-कानून लागू नहीं किया गया तो 22 जुलाई को गोपेश्वर नगर के तिराहे पर सरकार के खिलाफ धरना-प्रदर्शन करेंगे।
उन्होंने उत्तराखंड में भी हिमाचल प्रदेश की तर्ज पर भू-कानून बनाए जाने की मांग उठाई है। प्रधान संगठन के जिलाध्यक्ष मोहन सिंह नेगी ने कहा कि उत्तराखंड में सख्त भू-कानून बनना चाहिए। मौजूदा भू-कानून से पहाड़ की बेसकीमती भूमि औने-पौने दामों में बिक जाएगी। यह पहाड़ की संस्कृति के लिए भी खतरा है।
टिहरी: भू-कानून बनाने के लिए नहीं हुआ कोई आंदोलन
जिले में भू-कानून को बनाने के लिए अभी तक आंदोलन तो शुरू नहीं हुआ है, लेकिन सामाजिक संगठन और राजनीतिक दलों से जुड़े लोग सोशल मीडिया के माध्यम से मजबूत भू-कानून बनाने की पैरवी कर रहे हैं। उनका तर्क है कि भू-कानून बनाए जाने से जमीनों की खरीद फरोख्त पर रोक लग सकेगी।
पौड़ी: भू-कानून को लेकर नहीं हुआ कोई आंदोलन
भू-कानून लागू किए जाने की मांग को लेकर अभी तक कोई आंदोलन नहीं हुआ है, लेकिन समय-समय पर मीडिया व सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों ने इस दिशा में आवाज बुलंद जरूर की है। लोक गायक नरेंद्र सिंह नेगी प्रदेश में मजबूत भू-कानून लागू किए जाने को लेकर कई बार आवाज उठा चुके हैं।
रुद्रप्रयाग : उक्रांद ने किया भू-कानून का समर्थन
केदारनाथ विस के कांग्रेस विधायक मनोज रावत ने भू-कानून का समर्थन किया है। उन्होंने सरकार से इसे लागू करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि इस आंदोलन में आमजन की आवाज जुड़नी चाहिए। उन्होंने सरकार से विशेष सत्र बुलाकर भू-कानून को लागू करने की मांग की है। इधर, उत्तराखंड क्रांति दल ने भी भू-कानून का समर्थन किया है। पार्टी के केंद्रीय प्रवक्ता देवेंद्र चमोली व जिलाध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद नौटियाल का कहना है कि उत्तराखंड में भू-माफियाओं का राज चरम पर है। बुग्यालों तक जमीन पर कब्जा हो रहे हैं।
उत्तरकाशी: राजनीतिक पार्टियों ने किया समर्थन
जिले में राज्य भू-कानून को सख्त बनाए जाने की मांग को लेकर वर्तमान समय में कोई आंदोलन नहीं चल रहा है, लेकिन यह मांग शासन-प्रशासन को भेजे जाने वाले मांग पत्रों के साथ सोशल मीडिया पर जोर पकड़ती जा रही है। जिसके पक्ष में अब राजनीतिक पार्टियां भी आ रही हैं। जिले में भाजपा, कांग्रेस व उक्रांद नेताओं ने भू-कानून का समर्थन करते हुए सरकार से कानून पर विचार करने की मांग की है। वहीं आम आदमी पार्टी के नेता इस पर पार्टी नेतृत्व की ओर से जल्द विचार किए जाने की बात कह रहे हैं।