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नवी मुंबई में कौथिग के मंच पर पर्वतीय समाज ने मिलकर साझा की पीर पहाड़ की

Mon, 03 Feb 2020 10:27 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal नवी मुंबई से विनोद मुसान

सार

  • नवी मुंबई में कौथिग के मंच पर अमर उजाला संवाद कार्यक्रम में राज्य के ज्वलंत मुद्दों पर हुई चर्चा
  • उत्तराखंड के विकास में हाथ बंटाना चाहते हैं प्रवासी, कहा सरकार आगे आकर हमें पूछें तो 
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कौथिग में आयोजित संवाद - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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जल, जंगल, जमीन हो या नशा। पर्यावरण का मुद्दा हो या पर्यटन का। पलायन की बात हो या स्कूल, चिकित्सा और सड़क की। उत्तराखंड से जुड़े सबसे बड़े सवाल। जो महानगर मुंबई में उठे। मौका था नवी मुंबई के नेरूल में आयोजित उत्तराखंड प्रवासियों के सबसे बड़े संगठन कौथिग फाउंडेशन की ओर से कौथिग-2020 का।

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अमर उजाला संवाद कार्यक्रम की कड़ी में इसी मंच पर हमने प्रवासियों के साथ विमर्श किए उत्तराखंड के ज्वलंत मुद्दे। समस्याएं सामने आईं तो समाधान की राहें भी तलाशीं। प्रवासियों ने कहा जब हमने उत्तराखंड से पलायन किया, तब समस्याएं विकराल थी। रोजी-रोटी की तलाश हमें महानगरों में ले आई। लेकिन अब स्थितियां बदल गई हैं।

सरकारें चाहें तो प्रदेश के बाहर बढ़ते कदमों को रोका जा सकता है। आज अकेले मुंबई में 20 लाख से अधिक उत्तराखंडी लोग निवास करते हैं, इनमें से बहुत से लोग बड़े मुकाम पर पहुंच चुके। उत्तराखंड के विकास में ये भी आहूति देना चाहते हैं, लेकिन इसमें भी कई तरह की समस्याएं हैं। इन्हीं तमाम मुद्दों पर हमने संवाद कार्यक्रम में चर्चा की।

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नीति निर्धारण में तय हों प्राथमिकताएं

हिमालयी राज्यों की समस्याएं एक जैसी हैं, लेकिन कुछ राज्यों ने नीतियों का निर्धारण कर प्राथमिकताएं तय की हैं। हमारे सामने हिमाचल प्रदेश बड़ा उदाहरण है। लेकिन उत्तराखंड राज्य इस दिशा में वैसा काम नहीं कर पाया है। हमारी आज जो प्रमुख समस्याएं हैं, उनके निराकरण के लिए जरूरी है नीतियों के निर्धारण में प्राथमिकताएं तय की जाएं। राज्य में अधिकतर उद्योगों द्वारा जो कमाई हो रही है, उसका एक बड़ा हिस्सा राज्य के बाहर चला जा रहा है। ये पैसा राज्य में ही रोटेट होता तो इसका लाभ भी राज्य को ही मिलता। एक अध्ययन के अनुसार राज्य में इंटर स्टेट और इंटरा स्टेट पलायन देखा है, जिसमें इंटर स्टेट पलायन की दर में कमी आई, जबकि इंटरा स्टेट पलायन तेजी से बढ़ रहा है। मतलब लोग गांवों को छोड़कर छोटे-छोटे कस्बों की ओर बढ़ रहे हैं। हमें गांवों में शहरों जैसी बुनियादी जरूरतें उपलब्ध करवाकर पलायन की प्रवृत्ति को सुलभ साधनों से रोकाना होगा। - डॉ. पीएस रावत, अर्थशास्त्री, आरबीआई, मुंबई

एक बच्चे के साथ होता है तीन लोगों का पलायन

शहरों की ओर पलायन का सिलसिला कोई नया मसला नहीं है। गांवों में कृषि भूमि के कम होते जाने, आबादी बढ़ने और आपदाओं के चलते रोजी-रोटी की तलाश में ग्रामीणों को शहरों-कस्बों की ओर भागना पड़ा। गांवों में बुनियादी सुविधाओं की कमी भी पलायन का बड़ा कारण है। गांवों में रोजगार और शिक्षा के साथ-साथ बिजली, आवास, सड़क, संचार, स्वच्छता जैसी बुनियादी सुविधाएं शहरों की तुलना में बेहद कम हैं। आज सरकारी टीचर पढ़ाने के लिए सुदूर गांवों में तो पहुंच रहे हैं, लेकिन अपने बच्चों को शहरों में पढ़ाते हैं। इस दिशा में सरकार को पहल करनी होगी कि वहां ऐसी सुविधाएं जुटाई जाएं कि टीचर ही क्यों, कोई भी अपने बच्चे को बाहर न भेजे। शिक्षा के लिए जब एक बच्चे का पलायन होता है तो उसके साथ तीन और लोग पलायन कर जाते हैं।
- संगीता ढौंडियाल, लोक गायिका
 

प्रवासी उद्यमियों को भी अवसर दे सरकार

मैं मुम्बई में पिछले कई वर्षों से एडवरटाइजिंग और इवेंट के क्षेत्र में काम कर रहा हूं। आज देश मे हमारी कंपनी का बड़ा नाम है।  हम भी अपने राज्य के लिए बहुत कुछ करना चाहते है, लेकिन वहां की अफसरशाही ने कोई सकारात्मक पहल नहीं की है। मैं अपने राज्य की छवि को राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाना चाहता हूं, सरकार एक बार अवसर तो दें।    
- नरेंद्र जोशी, एड गुरु, जोशब्रो कम्पनी डायरेक्टर

युवाओं को मिलें रोजगार के अवसर

 राज्य के युवाओं के पास रोजगार नहीं होगा तो आप उन्हें कैसे रोकोगे? कुछ वर्षों में सरकारों ने विभिन्न पदों के लिए भर्ती विज्ञापन तो निकाले, लेकिन भर्तियां उस स्तर पर नहीं हो रही हैं। कुछ लोगों को जो रोजगार दिया भी, वह सैनिक कल्याण के नाम पर बनी संस्था उपनल द्वारा। सत्तारूढ़ दल के नेता उपनल के जरिए अपने-अपने लोगों को छिटपुट नौकरी दिलाने की जोड़-तोड़ में ही लगे रहते हैं। बेरोजगारी के बावजूद राज्य के कल-कारखानों में स्थानीय लोगों को नौकरी देने में प्राथमिकता नहीं बरती जा रही है, क्योंकि इसके लिए ठोस नीति नहीं बनाई गई है।
- नरेंद्र जंगपांगी, सामाजिक कार्यकर्ता

अपनी जड़ों से जोड़ने का अभियान है कौथिग

मुंबई में कौथिग आज ब्रांड बन गया है। हमारा मकसद सिर्फ सांस्कृतिक आयोजन करना भर नहीं है, बल्कि प्रवासी उत्तराखंडियों को अपनी जड़ों से जोड़ने का अभियान है। हमारा प्रयास है कि 10 दिनों के मंथन के बाद जो निष्कर्ष निकले, वो अपने समाज की तरक्की और बेहतरी के लिए हो। हम चाहते हैं कि सरकार प्रवासियों को अपने साथ जोड़े। राज्य के विकास में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करे। उत्तराखंड से बाहर रहने वाले प्रत्येक प्रवासी तक सरकार संपर्क करे, उनको एहसास दिलाएं की राज्य के विकास में प्रवासियों का भी अहम योगदान है। राज्य की नीतियों और योजनाओं में सरकार हमारे सुझावों को शामिल करे। 
- केशर सिंह बिष्ट, संयोजक, कौथिग फाउंडेशन

प्रवासियों की पीड़ा को भी समझे सरकार

उत्तराखंडियों के साथ उत्तराखंड सरकार को समन्वय स्थापित करना चाहिए। आज 15 से 20 लाख लोग मुंबई महानगर में हैं। उत्तराखंड सदन बन गया है, इसका उपयोग कैसे राज्य के विकास में हो, इस पर सरकार को सोचना होगा। सरकार को राज्यमंत्री स्तर का व्यक्ति यहां पर नामित करना चाहिए, जो सरकार और प्रवासियों के बीच समन्वय बना सके। मुख्यमंत्री जी को भी प्रवासी उत्तराखंडियों की पीड़ा को समझना होगा। जब भी मुंबई आएं तो एक संवाद प्रवासी समाज के साथ भी होनी चाहिए, ताकि राज्य के विकास में हम अपनी भागीदारी के लिए सुझाव दे सकें। 
-माधवानंद भट्ट, उद्योगपति

हमारे अनुभव का उपयोग करे सरकार

मुंबई में पिछले कई सालों से हूं। अपनी मेहनत के बल पर आज स्वयं का ट्रांसपोर्ट का काम है। 100 से ज्यादा वाहन हैं, जिनमें ट्रक, बस और छोटी गाड़ियां शामिल हैं। मुम्बई में पिछले कुछ सालों से उत्तराखंड प्रीमियर लीग करा रहा हूं, जिसका मैं चेयरमैन हूं। उत्तराखंड सरकार हमारे अनुभव और सहयोग को राज्य के विकास में उपयोग कर सकती है।
-सुरेश राणा, उद्योगपति

 
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हिमाचल से सीखने की है जरूरत

उत्तराखंड को बने हुए 19 साल हो गए, लेकिन राजनीतिक परिपक्वता का आभाव दिखता है। हमारे राजनेता संसाधनों का बेहतर उपयोग नहीं कर पाए। हमारे नेताओं को कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं थी, उन्हें हिमाचल मॉडल को फॉलो करना चाहिए था। हिमाचल और उत्तराखंड की भौगोलिक, सामाजिक स्थितियां लगभग समान हैं। अभी भी देर नहीं हुई है, हम अब भी हिमाचल से बहुत कुछ सीख सकते हैं।
-डॉ योगेश्वर शर्मा, अध्यक्ष, कौथिग फाउंडेशन

सरकार सोचे, हमारा उपयोग कैसे कर सकती है

मैं जनपद टिहरी से हूं। मेरे पिता काफी समय पहले मुंबई आ गए थे। मैंने स्वयं का व्यवसाय शुरू किया औऱ आज देश भर में अलग पहचान है। राज्य के विकास में हम पूरा सहयोग करना चाहते है, लेकिन ये सरकार को सोचना होगा कि हमारा उपयोग कैसे कर सकते हैं। निवेश एवं अन्य प्रकार के सहयोग में हम आगे आने को तैयार हैं।
-गिरवीर सिंह नेगी, उद्योगपति

नौकरी नहीं, स्वरोजगार पर दें ध्यान

ग्रामीण क्षेत्रों में शहरों जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। इसमें, परिवहन, सड़क, चिकित्सालय, शिक्षण संस्थाएं, विद्युत आपूर्ति, पेयजल, रोजगार और उचित न्याय व्यवस्था आदि शामिल हैं। युवाओं को भी चाहिए कि वे नोकरी के पीछे भागने के स्वरोजगार अपनाएं। आज उत्साही युवा स्वरोजगार अपनाकर बेहतर काम कर रहे हैं। उन्होंने न सिर्फ खुद के लिए स्वरोजगार जोड़ा, बल्कि अपने साथ दूसरे युवाओं को भी ट्रेनिंग देकर प्रदेश की अर्थव्यवस्था से कनेक्ट किया है।
-अरुण ढौंडियाल, टेलीकॉम सेक्टर

पेशेवर युवाओं को प्रोत्साहित करें सरकार

राज्य से पलायन हो रहा है, लेकिन बहुत से युवा लौट भी रहे हैं। मैंने स्वयं रिवर्स माइग्रेशन किया है। बंगलोर और दिल्ली में काम करने के बाद देहरादून आया हूं और पिछले 10 साल से  आईटी कंपनी चला रहा हूं। इसमे 30  युवा काम कर रहे हैं। अपनी जड़ों से जुड़ने के लिये मैंने हैले यूके एप बनाया है, जिससे गढ़वाली, कुमाउंनी और जौनसारी बोली/भाषा को किसी भी अन्य भाषा मे अनुवाद किया जा सकता है। सरकार को स्थानीय युवाओं, विशेषकर पेशेवर लोगो को प्रोत्साहित करना होगा।
-आकाश शर्मा, युवा उद्यमी, डब्ल्यू टी आईटी सल्यूशन

राज्यहित में हैं, प्रवासियों के सुझाव

राज्य सरकार की नीतियों और योजनाओं का लाभ प्रवासी उत्तरखंड वासियों को भी उठाना चाहिये। कौथिग और अमर उजाला संस्थान प्रवासी उत्तरखंड वासियो के बीच सेतु का कार्य कर सकता है। आज का संवाद कार्यक्रम में हुई परिचर्चा काफी सार्थक रही है। सरकार और प्रवासियों के बीच बेहतर समन्वय होने से निश्चित तौर पर सुखद परिणाम सामने आएंगे।
-सुरेश भट्ट, सूचना विभाग
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