दोकलम में शहीद जमीर मूलरूप से बरेली (यूपी) की तहसील बहेड़ी के ग्राम गननगला के रहने वाले थे। पुत्र सनाउल के अनुसार पिता की चंडीगढ़, मानेसर, देहरादून, दिल्ली आदि स्थानों पर जहां-जहां नौकरी रही, परिवार उनके साथ ही रहा। बाद में किच्छा के वार्ड 15 में मकान बनाने के बाद परिवार वहीं रहने लगा।
दो वर्ष पूर्व एक पुत्र की हो चुकी है मौत
शहीद जहीर अहमद के एक पुत्र की बीमारी के चलते दो वर्ष पूर्व भोजीपुरा में इलाज के दौरान मौत हो गई थी। उनकी बड़ी बेटी तरन्नुम का निकाह हो चुका है जबकि छोटी बेटी शहनाज सूरजमल कॉलेज में बीएड कर रही है। शहीद का बेटा सनाउल मुस्तफा सिविल इंजीनियरिंग कर चुका है और अपने भाई की मौत के बाद से बाद घर पर ही रह रहा है। इधर, शहीद की बेटी शहनाज ने बताया कि बीते शुक्रवार को दिन में उसकी अपने पिता से फोन पर बात हुई थी। शहनाज ने बताया कि सोमवार को सुबह 11 बजे से दोपहर एक बजे तक उनका बीएड का पेपर है। परीक्षा देने के बाद पिता की अंतिम विदाई में शामिल होंगी।
एनएसजी में तीन वर्ष रहे थे जमीर अहमद
डोकलाम में शहीद हुए किच्छा के लाल जमीर अहमद वर्ष 2009 से 2012 तक राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (एनएसजी) में रहे थे। सनाउल ने बताया कि पिता के एनएसजी में रहने के दौरान परिवार उनके साथ दिल्ली के निकट मानेसर में ही रहता था।