वन अनुसंधान केंद्र को देसी प्रजाति की मधुमक्खियों को तलाशने में सबसे अधिक मेहनत करनी पड़ी। वन अधिकारियों के मुताबिक, प्रदेश ही नहीं बल्कि देश में यूरोपियन प्रजाति की मधुमक्खियों का पालन बढ़ता चला जा रहा है। इस वजह से देसी प्रजातियों की मधुमक्खियों पर संकट है। अधिकारियों को बड़ी मुश्किल से कुमाऊं की गरुड़ घाटी में एक व्यक्ति के पास से देसी प्रजाति की मधुमक्खियां मिलीं।
1.08 लाख किस्म के पौधों का जीवन निर्भर है पॉलीनेटर्स पर
वन अनुसंधान केंद्र के अधिकारियों के मुताबिक, करीब 95 प्रतिशत फूल वाले पौधे को अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए तितली, मधुमक्खी आदि अन्य पॉलीनेटर्सकी जरूरत होती है। इस तरह से पॉलीनेटरन हों और मिट्टी पोषक तत्वों से भरपूर हो, तो भी 1.08 लाख किस्म के पौधे अपना अस्तित्व नहीं बचा पाएंगे।
पॉलीनेटरपार्क बनकर तैयार हो गया है। इसका मंगलवार को उद्घाटन किया जाएगा। पार्क को तैयार करने में वन विभाग ने देश के ख्यातिप्राप्त तितली विशेषज्ञों की भी मदद ली है। यह देश का पहला पॉलीनेटर पार्क है। इसमें 40 तरह के पॉलीनेटर्स हैं।
- संजीव चतुर्वेदी, निदेशक, वन अनुसंधान केंद्र