पूर्व में हाईकोर्ट में पेश हुए डा. मंजूनाथ ने कहा था कि समाज कल्याण विभाग ने अनुसूचित जाति के छात्रों की छात्रवृत्ति बांटने में सरकारी धन का दुरुपयोग किया है। कोर्ट को दिए गए शपथपत्र में डॉ. मंजूनाथ ने यह भी कहा था कि जांच में समाज कल्याण विभाग के अधिकारी सहयोग नहीं कर रहे हैं। एसआईटी सामान्य लोगों से मिले दस्तावेजों के सहारे ही जांच कर पा रही है। ऐसे में बुधवार को हुई सुनवाई में कोर्ट ने साफ कहा कि जांच को दबाने की मंशा से ही डा. मंजूनाथ का तबादला किया गया और एसआईटी टीम को बदला गया।
शासन के खिलाफ भी सख्त टिप्पणी
नैनीताल। इस मामले में कोर्ट में समाज कल्याण विभाग और मुख्य सचिव की ओर से शपथपत्र देकर दाखिल की गई जांच रिपोर्ट से भी कोर्ट असंतुष्ट रहा था। पूर्व की सुनवाई में कोर्ट ने मुख्य सचिव को नौ जनवरी को विस्तृत जांच रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने का आदेश दिया था। मुख्य सचिव की ओर से बुधवार को शपथपत्र पेश करने के लिए एक सप्ताह का समय और मांगा गया तो कोर्ट ने खासी नाराजगी जताई। मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने यहां तक कहा कि कार्यवाही को लटकाने के लिए ही समय की मांग की जा रही है।
सरकार की सुस्ती से नाराज कोर्ट ने 14 दिसंबर, 2018 की सुनवाई में यह भी कहा था कि क्यों न इस मामले की जांच सीबीआई से कराई जाए। याची रवींद्र जुगरान ने छात्रवृत्ति घोटाले के मामले में सीबीआई जांच की ही मांग की हुई है। सरकार की ओर से कोर्ट को बताया गया था कि मुख्यमंत्री के निर्देश पर एसआईटी गठित है।
इसके बाद भी कोई रिपोर्ट सामने न आने से नाराज कोर्ट ने एसआईटी के प्रभारी डा. टीसी मंजूनाथ को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में पेश होने का आदेश दिया था। डा. मंजूनाथ ने कोर्ट में कहा कि छात्रवृत्ति में सरकारी धन का दुरुपयोग हुआ है।
याची के अधिवक्ता एमसी पंत के मुताबिक 14 दिसंबर 2018 को सुनवाई में कोर्ट ने साफ कहा था कि क्यों न इस मामले की जांच सीबीआई को सौंपी जाए। याचिका 13 दिसंबर 2018 को दाखिल हुई थी। करीब छह सुनवाई इस मामले में हो चुकी हैं।