याचिकाकर्ता ने चयन प्रक्रिया को निरस्त करने की मांग की थी। याची के अधिवक्ता सीडी बहुगुणा ने तर्क दिया कि आयोग के साक्षात्कार बोर्ड में चार सदस्य शामिल थे, जिनमें शामिल एक सदस्य के अंडर में चयनित अभ्यर्थी पीएचडी कर रही है। इस सदस्य के माध्यम से ही चयन प्रक्रिया को प्रभावित किया गया।
यह भी कहा कि सहायक प्राध्यापक के पद पर चयन के लिए आयोग ने 100 फीसदी अंक साक्षात्कार के रखे थे, जो कि सुप्रीम कोर्ट के सर्वमान्य सिद्धांत की अवहेलना है। अधिवक्ता के मुताबिक मामले में फरवरी 2019 में स्टे मिल गया था। पक्षों की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने आयोग की चयन प्रक्रिया को निरस्त कर दिया है।