प्रदेश में घटते लिंगानुपात को लेकर हाईकोर्ट ने सख्ती दिखाई है। कोर्ट ने प्रदेश के सभी निजी अस्पतालों और डायग्नोस्टिक सेंटरों में अल्ट्रासाउंड और अल्ट्रासोनिक मशीनों में साइलेंट आब्जर्वर लगाने के निर्देश दिए हैं। हालांकि, प्रदेश सरकार ने कोर्ट में दावा किया कि सरकारी चिकित्सालयों में यह व्यवस्था कर दी गई है।
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वरिष्ठ न्यायमूर्ति राजीव शर्मा और न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। देहरादून निवासी रोहित ध्यानी ने हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर कहा था कि उत्तराखंड में हर साल लिंगानुपात घट रहा है।
इसका मुख्य कारण जन्म से पहले ही भ्रूण की जांच कराना है। उन्होंने भ्रूण की जांच कराने पर प्रतिबंध लगाने की मांग की। इस पर राज्य सरकार ने अपने जवाब में कहा कि सरकार ने सभी सरकारी अस्पतालों के अल्ट्रासाउंड और अल्ट्रासोनिक मशीनों में साइलेंट आब्जर्वर लगा दिए हैं और जन्म से पहले भ्रूण की जांच कराना प्रतिबंधित कर दिया है।
हाईकोर्ट के निर्देश
सभी गर्भवती महिलाओं का पंजीकरण किया जाए
उनके आहार की उचित व्यवस्था की जाए।
प्रसव से पहले उन्हें अस्पतालों में भर्ती किया जाए
उनके रहने, स्वास्थ्य आदि की उचित व्यवस्था की जाए।