रूलक सामाजिक संस्था के चेयरपर्सन अवधेश कौशल की ओर से हाईकोर्ट में पूर्व मुख्यमंत्रियों को दी जाने वाली सुविधाओं के खिलाफ जनहित याचिका दाखिल की गई थी। इस पर कोर्ट ने पूर्व मुख्यमंत्रियों से बकाया वसूलने के आदेश जारी किए थे। इस आदेश के खिलाफ पूर्व सीएम व महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी और विजय बहुगुणा ने हाईकोर्ट में रिव्यू याचिका दाखिल की लेकिन हाईकोर्ट ने उनकी नहीं सुनी और उन्हें पुराना बकाया चुकाने का आदेश जारी रखा।
इसमें भगत सिंह कोश्यारी ने बकाया चुकाने की हैसियत न होने की बात कही तो फिर कोर्ट ने चेतावनी दी थी कि क्यों न उनकी संपत्ति की जांच करा ली जाए। हाईकोर्ट में जब सरकार तथ्यों और तर्कों के आधार पर कुछ न कर पाई तो भगत सिंह कोश्यारी के लिए सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों का बकाया माफ करने और सुविधाएं जारी रखने के लिए अध्यादेश ले आए। अधिवक्ता की ओर से बताया गया कि कैबिनेट में गुपचुप निर्णय करके अध्यादेश को मंजूरी के लिए राजभवन भेज दिया गया था। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी बंगला सहित अन्य सुविधाएं देने के मामले में सरकार ने राज्य का एक्ट नहीं बनाया।
सरकार ने उत्तर प्रदेश का एक्ट लागू करना स्वीकार किया लेकिन उसे संशोधित नहीं किया। पिछले वर्ष कोर्ट में दिए गए हलफनामे में लागू एक्ट में लखनऊ का उल्लेख कर दिया, जबकि उत्तर प्रदेश के अधिनियम में साफ तौर पर अंकित था कि सुविधा सिर्फ लखनऊ में दी जा सकती है। इसलिए राज्य सरकार को यह स्वीकार करना पड़ा कि उत्तराखंड में इस संबंध में कोई अधिनियम प्रभावी नहीं है।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने बताया कि 1981 में यूपी में बने अधिनियम में साफ उल्लेख था कि मुख्यमंत्री, मंत्रियों को पद पर बने रहने तक सरकारी आवास मुफ्त मिलेगा। पद से हटने के 15 दिन में उन्हें आवास खाली करना होगा। 1997 में उत्तर प्रदेश सरकार ने इस नियम में बदलाव कर कहा कि अब पूर्व मुख्यमंत्रियों को आजीवन सरकारी आवास आवंटित किया जाएगा।
एक्ट में यह भी उल्लेख था कि आवास सिर्फ लखनऊ में ही दिया जाएगा, बाहर नहीं। 9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड बनने के बाद यह नियम यहां निष्प्रभावी हो गया। राज्य सरकार ने यूपी के एक्ट को उत्तराखंड के लिए मोडिफाई नहीं किया लेकिन कोर्ट में बताया कि सरकार ने 2004 में लोकसेवकों को प्रतिमाह एक हजार रुपये किराये पर आवास देने के रूल्स बनाए थे। इसमें कहा गया कि ट्रांसफर होने के बाद अधिकतम तीन माह तक लोकसेवक आवंटित आवास में रह सकते हैं, फिर हर हाल में खाली करना होगा। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता कार्तिकेय हरिगुप्ता ने बताया कि रूल्स सरकारी लोक सेवकों के लिए है, यह पूर्व मुख्यमंत्रियों पर लागू नहीं हो सकता।
बाजार दर से अभी तक किसी भी पूर्व सीएम ने जमा नहीं किया बकाया
अधिवक्ता ने बताया कि बाजार दर में अभी तक किसी ने भी बकाया जमा नहीं किया है। पूर्व सीएम डॉ. निशंक व विजय बहुगुणा ने किराया जमा करने की बात कही थी मगर यह किराया बाजार दर के हिसाब से नहीं जमा किया गया है। पहले शपथपत्र में सरकार ने हाईकोर्ट को बताया कि राज्य कैबिनेट ने पूर्व मुख्यमंत्रियों पर बकाया माफ करने का निर्णय लिया है। जब याचिकाकर्ता के अधिवक्ता की दलील पर कोर्ट ने कैबिनेट निर्णय की प्रति मांगी तो पता चला कि कैबिनेट ने हाईकोर्ट से किराया माफ करने की प्रार्थना का उल्लेख किया था। इसके लिए सरकार ने गलती स्वीकारी।
यूपी में लागू ऐसे ही अधिनियम को सुप्रीम कोर्ट 2016 में कर चुकी है निरस्त
सुप्रीम कोर्ट ने 2016 में उत्तर प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्रियों को आवासीय व अन्य सुविधाएं देने के लिए 1997 में लागू अधिनियम को असांविधानिक करार देते हुए निरस्त कर दिया था। अधिवक्ता का कहना था कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश पूरे राज्य में लागू होता है। सरकार ने हलफनामे में यह नहीं बताया कि पूर्व मुख्यमंत्रियों द्वारा जनहित में किए गए कार्य कैसे अमूल्य सेवा का हिस्सा बन गए। राज्य 48 हजार करोड़ के वित्तीय घाटे में है और तेल नहीं होने की वजह से एंबुलेंस खड़ी हैं, ऐसे में पूर्व सीएम से पूरी राशि वसूल की जानी चाहिए।