वाणिज्य कर विभाग (अब राज्य कर विभाग) के अफसरों और औद्योगिक घरानों की मिलीभगत से सरकार को दस हजार करोड़ राजस्व की चपत लगाने के मामले में दायर जनहित याचिका को हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है। अदालत ने याचिका में गलत तथ्य पेश करने पर याचिकाकर्ता पर एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। पूर्व में कोर्ट ने 19 अप्रैल 2018 को आदेश पारित कर याचिकाकर्ता को एक लाख की जमानत राशि हाईकोर्ट में जमा करने के निर्देश दिए थे।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रविकुमार मलिमथ एवं न्यायमूर्ति एनएस धानिक की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। 2017 में रुड़की निवासी धर्मेंद्र सिंह ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि वाणिज्य कर विभाग (अब राज्यकर विभाग) के अधिकारी औद्योगिक घरानों और उघोगपतियों के साथ मिलकर सरकार को राजस्व का नुकसान पहुंचा रहे हैं।
इस मामले की शिकायत करने पर राज्य कर आयुक्त ने कुछ अधिकारियों को नोटिस भेजे लेकिन उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। याचिका में राज्य के मुख्य सचिव, वित्त सचिव, राजस्व सचिव, अतिरिक्त वित्त सचिव, मुख्य राजस्व आयुक्त, वाणिज्य कर आयुक्त, आयकर विभाग, सीबीआई, विशेष आयुक्त दून समेत 47 अधिकारियों को पक्षकार बनाया गया था। याचिका में कहा गया था कि विभाग भ्रष्टाचार और कमीशनखोरी का अड्डा बन गया है। याचिकाकर्ता ने विभागीय अधिकारियों के खिलाफ सीबीआई जांच की मांग की थी।
13 अक्तूबर 2017 को यह मामला हाईकोर्ट में आया था। याचिकाकर्ता का कहना था कि करीब दस हजार करोड़ रुपये वार्षिक राजस्व नुकसान प्रदेश को इस मिलीभगत के कारण हो रहा है। याचिकाकर्ता ने विभागीय अधिकारियों की संपत्ति की जांच की भी मांग की थी। याची ने यह भी मांग की थी कि आयकर विभाग भी इन अफसरों की संपत्ति की जांच करे। पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने याचिका को तथ्यहीन मानते हुए उसे खारिज कर दिया। कोर्ट ने याचिकाकर्ता पर एक लाख का जुर्माना भी लगाया है।